पुरी शंकराचार्य श्री निरञ्जन देव तीर्थ जी महाराज

आप सन् १९६४ से १९९२ तक जगन्‍नाथपुरी के शंकराचार्य के पीठ पर आसीन रहे। आपको संन्‍यास की दीक्षा , स्‍वामी अभिनव सच्चिदानन्‍द तीर्थ‍ महाराज द्वारा प्रदान की गयी थी।
आपका जन्‍म ब्‍यावर राजस्‍थान निवासी श्री गणेशलाल द्विवेदी के यहां आश्विन कृष्‍ण १४ संवत् १९६७ को हुआ । प्रारम्भिक संस्‍कृत की शिक्षा के पश्‍चात् सम्‍पूर्णानन्‍द संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय से व्‍याकरण शास्‍त्री, व्‍याकरणाचार्य आदि की उपाधि प्राप्‍त की । इसके साथ ही काशी में रहते हुए आपने व्‍याकरण मीमांसा, वेदान्‍त दर्शन तथा न्‍यायशास्‍त्र का अध्‍ययन किया।
अध्‍ययन के पश्‍चात् पं० चन्‍द्रशेखर द्विवेदी नारायण संस्‍कृत कालेज पेटलाद में प्राचार्य पद पर नियुक्‍त हुए। आप पूज्य श्री करपात्री जी के विशेष अनुयायायी रहे तथा उनके द्वारा स्‍थापित अखिल-भारतीय-रामराज्‍य-परिषद् के मन्त्री पद पर भी आपने कार्य किया तथा श्री करपात्री जी के निर्देश पर ऋषिकुल ब्रहमचर्याश्रम हरिद्वार में दो वर्ष तक प्राचार्य रहे। इस अवधि में अनेकों यज्ञों का अनुष्‍ठान सम्‍पन्‍न किया । राजस्‍थान लोक सेवा आयोग से चयन के फलस्‍वरूप १९५५ से १९६४ तक महाराजा संस्‍कृत कालेज , जयपुर के प्राचार्य पद पर भी आसीन रहे । सन् १९६६ ,१९६७ के गोरक्षा आन्‍दोलन में आपने लगातार ७२ दिन का अनशन दिल्‍ली जेल में किया । हिन्‍दू कोड बिल तथा गौ हत्‍या विरोध आन्‍दोलन का भी आपने सफल नेतृत्‍व किया। आपने शास्‍त्र सम्‍मत सभी परम्‍पराओं का कट्टर समर्थन किया। आप धर्म आधारित व्‍यवस्‍था के प्रबल समर्थक थे एवं पाखण्ड के प्रबल विरोधी एक ऐसे पुण्यपुञ्ज थे , जिन्होंने सनातन वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार एवं संवर्द्धन में अपना पूरा जीवन लगा दिया।

जगद्गुरू शंकराचार्य की महान् परम्परा को गौरवान्वित करने वाले श्री निरञ्जन देव तीर्थ जी महाराज वास्तव में एक अलौकिक व्यक्तित्व के धनी महात्मा थे ।

।। जय श्री राम ।।

Adi shankaracharya(आदि शङ्कराचार्य)

Around 507 B.C. there descended on the sacred, deeply adorable soil of this holy land a personality extraordinary who by the sheer force of his matchless erudition, enlightened the whole world. He was none other than Acharya Adi Shankara, a very embodiment of Lord Shiva, tenth in the line of Guru traceable back to Sriman Narayana himself. He had dispelled one for all the thousand and one dark force that were hitting hard at the very foundation of Sanatana Dharma and flew aloft unshakably the banner of Sanatana Dharma, thus establishing its invulnerability once for all. As is anybody’s guess, all this he accomplished solely by his all-too-rare spiritual wisdom, luster and strength, in short, his spiritual process.

His holiness Adi Shankaracharya was born in Kaladi villege of Kerala.His father’s name was Shivaguru and mother’s name was Sati Aryamba. He was by cast Nambudaripad Brahmin. He was born on Yudhisthir Sambat 2631 in 507 B.C. on Vaishakha Sukla Panchami on Sunday. His thread ceremony took place at the age of 5 years. Taking his mother’s  blessings, he left hearth and home as a body  to take a life of Sanyasa initiated by Shree Govindapadacharya on the auspicious day in the Kartik month on Devothana Ekadashi. From the age of 5 to 8 years Acharya Shankara learnt deep studies on the Vedas, Vedanga, Dharma Shastra, Purana, History and Budhagama etc. According to Sanatana Dharma and Shiva Purana, Hindus call Adi Shankaracharya as reincarnation of Lord Shiva. According to Adi Shankaracharya philosophy all the four Peeth’s Acharya are known as Shankaracharya.

Acharya Shankara within a short span of sixteen years re-established Sanatana Dharma after overcoming not only Budhism and other directionless religions but also climes and languages and incarnation (Tantra Mantra). His holy body left in demise at the age of 32 years in the year 2663 says 475 B.C. on the holy day of Kartika Poornima.

जगतगुरु शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज

श्री ऋगवैदिय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के वर्तमान 145 वें श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज भारत के एक ऐसे सन्त हैं जिनसे आधुनिक युग में विश्व के सर्वोच्च वैधानिक संगठनों संयुक्त राष्टसंघ तथा विश्व बैंक तक ने मार्गदर्शन प्राप्त किया है | संयुक्त राष्टसंघ ने दिनांक 28 से 31 अगस्त 2000 को न्यूयार्क में आयोजित विश्वशांति शिखर सम्मेलन तथा विश्व बैंक ने वर्ल्ड फेथ्स डेवलपमेन्ट डाइलॉग- 2000 के वाशिंगटन सम्मेलन के अवसर पर उनसे लिखित मार्गदर्शन प्राप्त किया था | श्री गोवर्धन मठ से संबंधित स्वस्ति प्रकाशन संस्थान द्वारा इसे क्रमश: विश्व शांति का सनातन सिद्धांत तथा सुखमय जीवन सनातन सिद्धांत शीर्षक से सन् 2000 में पुस्तक रूप में प्रकाशित किया है | वैज्ञानिकों ने कम्प्यूटर व मोबाईल फोन से लेकर अंतरिक्ष तक के क्षेत्र में किये गये आधुनिक आविष्कारों में वैदिक गणितीय सिद्धांतों का उपयोग किया है जो पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारा रचित स्वस्तिक गणित नामक पुस्तक में दिये गये हैं । गणित के ही क्षेत्र में पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य जी महाराज की अंक पदीयम् तथा गणित दर्शन नाम से दो और पुस्तकों का लोकार्पण हुआ है, जो निश्चित ही विश्व मंच पर वैज्ञानिकों के लिए विभिन्न क्षेत्रों में नए आविष्कारों के लिए नए परिष्कृत मानदंडों की स्थापना करेंगे |

अपनी भूमिका से भारत वर्ष को पुन: विश्वगुरू के रूप में उभारने वाले पूज्यपाद जगद्गुरू श्री शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज का जन्म ७२ वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त के मिथिलाच्जल में दरभंगा (वर्तमान में मधुबनी) जिले के हरिपुर बख्शीटोलमानक गांव में आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी, बुधवार रोहिणी नक्षत्र, विक्रम संवत् 2000 तदानुसार दिनांक 30 जून ई | 1943 को हुआ | देश-विदेश में उनके अनुयायी उनका प्राकट्य दिवस उमंग व उत्साहपूर्वक मनाते हैं | पूज्य पिताजी पं | श्री लालवंशी झा क्षेत्रीय कुलभूषण दरभंगा नरेश के राज पंडित थे | आपकी माताजी का नाम गीता देवी था | आपके बचपन का नाम नीलाम्बर था |

आपकी प्रारंभिक शिक्षा बिहार और दिल्ली में सम्पन्न हुई है | दसवीं तक आप बिहार में विज्ञान के विद्यार्थी रहे | दो वर्षों तक तिब्बिया कॉलेज दिल्ली में अपने अग्रज डॉ | श्री शुक्रदेव झा जी की छत्रछाया में शिक्षा ग्रहण की पढ़ाई के साथ-साथ कुश्ती, कबड्डी और तैरने में अभिरूचि के अलावा आप फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी थे | बिहार और दिल्ली में आप छात्रसंघ विद्यार्थी परिषद के उपाध्यक्ष और महामंत्री भी रहे | अपने अग्रज पं | श्रीदेव झा जी के प्रेरणा से अपने दिल्ली में सर्व वेद शाखा सम्मेलन के अवसर पर पूज्यपाद धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज एवं श्री ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के पीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री कृष्णबोधाश्रम जी महाराज का दर्शन प्राप्त किया | इस अवसर पर उन्होंने पूज्य करपात्री जी महाराज को हृदय से अपना गुरूदेव मान लिया | तिब्बिया कालेज में जब आपकी सन्यास की भावना अत्यंत तीव्र होने लगी तब वे बिना किसी को बताये काशी के लिए पैदल ही चल पड़े | इसके उपरांत आपने काशी, वृन्दावन, नैमिषारण्य, बदरिकाआश्रम, ऋषिकेश, हरिद्वार, पुरी, श्रृंगेरी आदि प्रमुख धर्म स्थानों में रहकर वेद-वेदांग आदि का गहन अध्ययन किया | नैमिषाराण्य के पू्ज्य स्वामी श्री नारदानन्द सरस्वती जी ने आपका नाम ‘ध्रुवचैतन्य’ रखा | आपने 7 नवम्बर 1966 को दिल्ली में देश के अनेक वरिष्ठ संत-महात्माओं एवं गौभक्तों के साथ गौरक्षा आन्दोलन में भाग लिया | इस पर उन्हें 9 नवम्बर को बन्दी बनाकर 52 दिनों तक तिहाड़ जेल में रखा गया |

बैशाख कृष्ण एकादशी गुरूवार विक्रम संवत् 2031 तद्नुसार दिनांक 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में आपका लगभग 31 वर्ष की आयु में पूज्यपाद धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के करकमलों से सन्यास सम्पन्न हुआ और उन्होंने आपका नाम ‘निश्चलानन्द सरस्वती’ रखा | श्री गोवर्धन मठ पुरी के तत्कालीन 144 वें शंकराचार्य पूज्यपाद जगद्गुरू स्वामी निरन्जनदेव तीर्थ जी महाराज ने स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती को अपना उपयुक्त उत्तराधिकारी मानकर माघ शुक्ल षष्ठी रविवार वि | संवत् 2048 तद्नुसार दिनांक 9 फरवरी 1992 को उन्हें अपने करकमलों से गोवर्धनमठ पुरी के 145 वें शंकराचार्य पद पर पदासीन किया | शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के तुरन्त बाद आपने ‘अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा, देश की सुरक्षा और अखण्डता’ के उद्देश्य से प्रामाणिक और समस्त आचार्यों को एक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए राष्ट रक्षा के इस अभियान को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान कराने की दिशा में अपना प्रयास आरंभ कर दिए | राष्टरक्षा की अपनी राष्ट व्यापी योजना को मूर्तरूप दिलाने हेतु उन्होंने देश के प्रबुद्ध नागरिकों के लिए ‘पीठ परिषद’ और उसके अन्तर्गत युवकों की ‘आदित्य वाहिनी’ तथा मातृशक्ति के लिए आनन्द वाहिनी के नाम से एक संगठनात्मक परियोजना तैयार की | इसमें बालकों के लिए ‘बाल आदित्य वाहिनी’ एवं बालिकाओं हेतु बाल आनंद वाहिनी की व्यवस्था भी की गई | पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज ने चैत्र शुक्ल नवमी शनिवार विक्रम संवत् 2049 तद्नुसार दिनाकं 4 अप्रैल सन् 1992 को रामनवमी के शुभ दिन पर श्री गोवर्धनमठपुरी में ‘पीठ परिषद’ और उसके अंतर्गत ‘आदित्य वाहिनी’ का शुभारंभ करवाया | कलियुग में संघ के शक्ति सन्निहित हैं | धर्म, ईश्वर और राष्ट से जोड़ने का कार्य संघ द्वारा सम्पन्न हो, यह आवश्यक है |

पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी द्वारा स्थापित पीठ परिषद और उसके अंतर्गत आदित्य वाहिनी एवं आनन्द वाहिनी का मुख्य उद्देश्य ‘अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा, देश की सुरक्षा और अखण्डता’ है | पूज्यपाद महाराज श्री का अभियान मानव मात्र को सुबुद्ध, सत्य सहिष्णु और स्वावलम्बी बनाना है | उनका प्रयास है कि पार्टी और पन्थ में विभक्त राष्ट को सार्वभौम सनातन सिद्धान्तों के प्रति दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक धरातल पर आस्थान्वित कराने का मार्ग प्रशस्त हो | उनका ध्येय है कि सत्तालोलुपता और अदूरदर्शिता के वशीभूत राजनेताओं की चपेट से देश को मुक्त कराया जाये | बड़े भाग्यशाली हैं वे लोग जिन्हें विश्व के सर्वोच्च ज्ञानी के रूप में प्रतिष्ठित इन महात्मा द्वारा चलाये जा रहे अभियान में सहभागी बनने और जिम्मेदारी निभाने का सुअवसर मिला हुआ है | परमपूज्य गुरूदेव के चरणों में कोटिश: नमन तथा चन्द्रमौलीश्वर भगवान से दीर्घायुष्य एवं आसेम्यता के लिए प्रार्थना है |

Glory of His Holiness Shrimad Jagadguru Lord Adi Shanakacharya .

शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम् ।

सूत्र-भाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुन: पुन: ॥

Shankara the Avtaar of Shiva and Badrayana VedaVyasa the Avtaar of Vishnu both have created and written commentry on vedic scriptures . I pay my regards & dedicated devotion to both of the lords .

Glory of His Holiness Shrimad Jagadguru Lord Adi Shanakacharya .

The major role in refining & giving the reorganized structure to sanatan dharma by the divine and supreme efforts is done by His Holiness Adi Shankara . During 2500 years before those who have departed themselves from sanatan dharma and created their own sect for name , fame , power they on the basis of condeming the vedic scriptures and spreading the illusions against vedas wants to extend their sect . In such condition the whole ” Bharata ” got trapped in controversies , clashes , collisions between sects . The vedic sects Shaiva , vaishnav , shakta , ganapatya , surya are divided because of their various ritual differences they are unable to resist these illusions which are being spreaded by non-vedics against vedas. Non-Vedic sects have started convertion in hinduism through propoganda against vedas . During such cruscial and against circumstances Lord Shiva has taken incarnation ( Avtaar ) as lord jagadguru Adi Shanakacharya in order to reunite sanatan dharma and to re-establish it . Adi Shankara taken avtaar in kalady kerela at the time period 507 B.C. in the scholar bramhin family in the home of Shivaguru Bhairava datta father and mother Sati Aryamba mother of Adi Shankara. Shankara mastered on vedas upto age of childhood when he was 8 years old . At the age of 9 years Adi Shankara leaved home and taken sanayasa by guru govindapada on the bank of river narmada . In the age of 12 & upto 16 years Shankara has written commentary on upanishads , bramhasutras and bhagvada gita. After the age of 16 years Adi Shankara has started his journey known as ” Shankara Digvijay ” around the country . Shankara challenged the non-vedics to debate with him on scriptures and vedas . Shankara has proved himself and vedic scriptures as immortal and universal all time correct in his debate and shankara proved himself immortal and victorious in his debate by defeating the non-vedic. After the nationwide victory in debate on vedas Adi Shankara has established the vedic monastries in four parts of bharat which is also known as amanaya peethas and shankaracharya mathas and given each vedic monastaries a particular veda and given these amanaya peethas responsibilities to always secure the particular veda . Adi Shankacharya after establishing amanaya peethas created the monk order under these peethas which is known as ” Dashnami’s ” . The Dashnami’s under these peethas given responsibility by Adi Shankara in order to secure holi vedas in all the holy cities , mountains , coastal sea areas , gurukuls , ashrams , jungles , forest . After then Lord Adi Shankara has refined the law and Administration and governance which was conducted by empires and kingdomship at that time . Lord Adi Shankara has given the throne of united india to the vedic king Sudhanva and established the vedic empire in united india . After giving the reorganized structure to Sanatan Dharma lord Adi Shankara completed his avtaar and returned to his abode the Holy Kailash . Jai Jai Shankara Hara Hara Shankara .

 

जगदगुरु शंकराचार्य श्री स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज-जीवन परिचय

स्वामी भारती कृष्णतीर्थ जी महाराज (14 मार्च 1884 – 2 फ़रवरी 1960) जगन्नाथपुरी में श्री ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के 143 वें शंकराचार्य थे। शास्त्रोक्त अष्टादश विद्याओं के ज्ञाता, अनेक भाषाओं के प्रकांड पंडित तथा दर्शन के अध्येता पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्णतीर्थ जी महाराज ने वैदिक गणित की खोज कर समस्त विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया था। वे एक ऐसे अनूठे धर्माचार्य थे जिन्होंने शिक्षा के प्रसार से लेकर स्वदेशी, स्वाधीनता तथा सामाजिक क्रांति में अनूठा योगदान कर पूरे संसार में ख्याति अर्जित की थी।

14 मार्च 1884 को तिरुन्निवल्ली में डिप्टी कलेक्टर पी. नृसिंह शास्त्री के पुत्र के रूप में जन्में वेंकटरमण जन्मजात असाधारण प्रतिभा के स्वामी थे। उन्होंने सन्‌ 1904 में एक साथ सात विषयों में एम.ए. किया। साहित्य, भूगोल, इतिहास, संगीत, गणित, ज्योतिष जैसे विषयों में उनकी गहरी पैठ थी।

जिन दिनों वे बड़ौदा कॉलेज में विज्ञान तथा गणित के प्राध्यापक थे, उसी कॉलेज में महर्षि अरविंद दर्शनशास्त्र का अध्यापन करते थे। दोनों संपर्क में आए तथा राष्ट्रीय चेतना जागृत कर देश को स्वाधीन कराने के लिए योजना बनाने लगे। सन्‌ 1905 में बंगाल में स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा। वेंकटरमण शास्त्री तथा महर्षि अरविंद दोनों ने कलकत्ता पहुंचकर उसे गति प्रदान की। उनके ओजस्वी तथा तर्कपूर्ण भाषणों से बंगाल का प्रशासन कांप उठा था। वेंकटरमण शास्त्री की रुचि आध्यात्म की ओर बढ़ी तथा उन्होंने शृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह सरस्वतीजी महाराज के सानिध्य में कठोरतम योग साधना की। गोवर्धनपीठ, पुरी के शंकराचार्य स्वामी मधुसूदन तीर्थ ने उन्हें संन्यास दीक्षा देकर वेंकटरमण की जगह स्वामी भारती कृष्णतीर्थ नामकरण कर दिया।

सन्‌ 1921 में उन्हें शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त किया गया। उसी वर्ष उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस महासमिति की कार्यकारिणी का सदस्य मनोनीत किया गया। स्वामीजी ने राजधर्म और प्रजाधर्म विषय पर एक भाषण दिया जिसे सरकार ने राजद्रोह के लिए भड़काने का अपराध बताकर उन्हें गिरफ्तार कर कराची की जेल में बंद कर दिया। बाद में स्वामीजी कांग्रेस के चर्चित अली बंधुओं के साथ बिहार की जेल में भी रहे। कारागार के एकांतवास में ही स्वामीजी ने अथर्ववेद के सोलह सूत्रों के आधार पर गणित की अनेक प्रवृत्तियों का समाधान एवं अनुसंधान किया। वे बीजगणित, त्रिकोणमिति आदि गणितशास्त्र की जटिल उपपत्तियों का समाधान वेद में ढूढ़ने में सफल रहे। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अनेक विश्ववविद्यालयों में गणित पर व्याख्यान दिए। कुछ ही दिनों में देश-विदेश में उनकी खोज की चर्चा होने लगी।

Bharatikrishna Teertha

स्वामीजी ने अंगरेजी में लगभग पांच हजार पृष्ठों का एक वृहद ग्रंथ ‘वंडर्स ऑफ वैदिक मैथेमेटिक्स’ लिखा। स्वामीजी के इस ग्रंथ का वैदिक गणित के नाम से हिंदी अनुवाद किया गया। स्वामी जी ने वैदिक गणित के अलावा ब्रह्मासूत्र भाष्यम, धर्म विधान तथा अन्य अनेक ग्रंथों का भी सृजन किया। ब्रह्मासूत्र के तीन खंडों का प्रकाशन कलकत्ता विश्वविद्यालय ने किया। सन्‌ 1953 में उन्होंने विश्वपुनर्निर्माण संघ की स्थापना की। उनका मत था कि आध्यात्मिक मूल्यों के माध्यम से ही विश्वशांति स्थापित की जा सकती है।

स्वामी भारती कृष्णतीर्थ आद्य शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित मठों के शंकराचार्य की शृंखला में एक ऐसे अनूठे धर्माचार्य थे। जिनके व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रतिभा तथा विभिन्न विधाओं का अनूठा संगम था। अनूठे ज्ञान से मंडित होने के बावजूद वे परम विरक्त तथा परमहंस कोटि के संन्यासी थे। वे अस्वस्थ हुए-उनके भक्तों की इच्छा थी कि उन्हें अमेरिका ले जाकर चिकित्सा कराई जाए। उन्होंने 2 फ़रवरी 1960 को निर्वाण प्राप्त करने से एक सप्ताह पूर्व ही कह दिया था कि संन्यासी को नश्वर शरीर की चिंता नहीं करनी चाहिए, जब भगवान का बुलावा आए उसे परलोक गमन के लिए तैयार रहना चाहिए।

Adi shankaracharya

Around 507 B.C. there descended on the sacred, deeply adorable soil of this holy land a personality extraordinary who by the sheer force of his matchless erudition, enlightened the whole world. He was none other than Acharya Adi Shankara, a very embodiment of Lord Shiva, tenth in the line of Guru traceable back to Sriman Narayana himself. He had dispelled one for all the thousand and one dark force that were hitting hard at the very foundation of Sanatana Dharma and flew aloft unshakably the banner of Sanatana Dharma, thus establishing its invulnerability once for all. As is anybody’s guess, all this he accomplished solely by his all-too-rare spiritual wisdom, luster and strength, in short, his spiritual process.

His holiness Adi Shankaracharya was born in Kaladi villege of Kerala.His father’s name was Shivaguru and mother’s name was Sati Aryamba. He was by cast Nambudaripad Brahmin. He was born on Yudhisthir Sambat 2631 in 507 B.C. on Vaishakha Sukla Panchami on Sunday. His thread ceremony took place at the age of 5 years. Taking his mother’s  blessings, he left hearth and home as a body  to take a life of Sanyasa initiated by Shree Govindapadacharya on the auspicious day in the Kartik month on Devothana Ekadashi. From the age of 5 to 8 years Acharya Shankara learnt deep studies on the Vedas, Vedanga, Dharma Shastra, Purana, History and Budhagama etc. According to Sanatana Dharma and Shiva Purana, Hindus call Adi Shankaracharya as reincarnation of Lord Shiva. According to Adi Shankaracharya philosophy all the four Peeth’s Acharya are known as Shankaracharya.

Acharya Shankara within a short span of sixteen years re-established Sanatana Dharma after overcoming not only Budhism and other directionless religions but also climes and languages and incarnation (Tantra Mantra). His holy body left in demise at the age of 32 years in the year 2663 says 475 B.C. on the holy day of Kartika Poornima.

Adi Shankaracharya’s Successors of Govardhan Matha , Puri

  1. Padmapada(First Matha In Charge Appointed By Adi Shankaracharya)
  2. Ananta Shree Sula Pani
  3. Narayana
  4. Bidyaranya
  5. Vamdev
  6. Padmanabh
  7. Jagannath
  8. Madhureswar
  9. Govinda
  10. Sridhara
  11. Madhavananda
  12. Krishna Brahmananda
  13. Ramananda
  14. Vagiswara
  15. Parameswar
  16. Gopala
  17. Janardana
  18. Jnanananda
  19. Brihadaranya
  20. Mahadeva
  21. Parama Brahmananda
  22. Ramananda
  23. Sadashiva
  24. Harishvarananda
  25. Bodhananda
  26. Ramakrishna
  27. Chit Bodhatma
  28. Tattwaksavara
  29. Sankara
  30. Vasudeva
  31. Hayagriva
  32. Smritiswara
  33. Vidyananda
  34. Mukundananda
  35. Hiranyagarbha
  36. Nityananda
  37. Sivananda
  38. Yogiswara
  39. Sudarshan
  40. Vyomakesha
  41. Damodar
  42. Yogananda
  43. Golakesha
  44. Krishnananda
  45. Devananda
  46. Chandrachurha
  47. Halayudha
  48. Sidhya Sevya
  49. Tarakatma
  50. Bodhayana
  51. Sridhara
  52. Narayana
  53. Sadashiva
  54. Jayakrishna
  55. Virupaksha
  56. Vidyaranya
  57. Viseshwara
  58. Vibodheshwara
  59. Maheswara
  60. Madhusudana
  61. Raghuttama
  62. Ramachandra
  63. Yogindra
  64. Moheswara
  65. Omara
  66. Narayam
  67. Jagannatha
  68. Sridhara
  69. Ramachandra
  70. Tamrakh
  71. Ugreswara
  72. Uddanda
  73. Sankarshana
  74. Janardana
  75. Akhandatma
  76. Damodara
  77. Sivananda
  78. Gaddadhara
  79. Vidyadhara
  80. Vamana
  81. Shankara
  82. Nilakantha
  83. Ramakrishna
  84. Raghuttama
  85. Samodara
  86. Gopala
  87. Mrityunjaya
  88. Govinda
  89. Vasudeva
  90. Gangadhara
  91. Sadashiva
  92. Vamadeva
  93. Upamanyu
  94. Hayagriva
  95. Hari
  96. Raghuttama
  97. Pundarikakshya
  98. Parashankara Tirtha
  99. Vedagarbha
  100. Vedanta Bhaskara
  101. Vinanatma
  102. Sivananda
  103. Maheswara
  104. Ramakrishna
  105. Vrisadhwaja
  106. Sudhabodha
  107. Someswara
  108. Gopadeva
  109. Sambhu Tirtha
  110. Bhrigu
  111. Keshavananda
  112. Vidyananda
  113. Vedananda
  114. Bodhananda
  115. Sutapananda
  116. Sridhara
  117. Janardana
  118. Kamanasanananda
  119. Hariharananda
  120. Gopala
  121. Krishnananda
  122. Madhavananda
  123. Madhusudana
  124. Govinda
  125. Raghuttama
  126. Vamadeva
  127. Hrishikesha
  128. Damodara
  129. Gopalananda
  130. Govinda
  131. Raghunatha
  132. Ramachandra
  133. Govinda
  134. Raghunatha
  135. Ramakrishna
  136. Madhusudana
  137. Damodara
  138. Raghuttama
  139. Siva(1849-1870)
  140. Lokanatha(1870-1883)
  141. Damodara Tirtha(1883-1898)
  142. Madhusudana Tirtha(1898-1926)
  143. Bharati Krishna Tirtha(1926-1960)
  144. Shree Niranjana Deva Tirtha(1.7.64-8.2.92)
  145. Shree Nishchalananda Saraswati(9.2.92) Acharya: Jagadguru Shankaracharya Sri Nischalananda Saraswati

 

Govardhan Math

Bhagvatpada Adi Shankaracharya established four monasteries in the four corners  of India.  2500 years ago, on the auspicious tenth day of the bright fortnight of the month of vasisakh, Bhagvatpada Adi Shankaracharya established the eastern monastery associated with Rigved called as “Poorvamnaya Sri Govardhan Math- Bhogavardhan Peetham”. Acharya Padmapada was ceremonDSC02970iously installed as the first Sankaracharya of Govardhan Math, . That very day- which goes down as a doubly significant day in the annually of this math for that had been hurried underground for fear of vandalisation by iconoclasts, got fresh  bodies made for them and consummated the process by installing them on the highly sacred Ratna simhasan ( a throne bedecked with precious jewels). He also ruled authoritatively that Shri  Jagannath Mahaprabhu and Goddess Vimala Devi be the male and female presiding  deities of Govardhan math respectively. More importantly, he revives the age old rituals and modes of worship that had long ceased to be. Not merely that, he also put in place a Bhoga mandapa right within the Jagannath temple to ensure easy access of devotees to Mahaprasad. Since that day right down to this day, the Shankarcharya of Govardhan math, Puri have been religiously handling their onerous responsibilities in respect of the unbroken maintenance of this great tradition.

The whole of the Eastern India viz. Bihar, Jharkhand, Chittasgarh, Andhra till Rajmahendri, Orissa, Bengal, Nepal, Bangladesh (Undivided India), Assam, Arunachal Pradesh, Manipur, Sikkim, Bhutan, Meghalaya, Tripura, Mizoram, Uttarapradesh till Prayaga including Gaya and Varanasi are considered as the territory of Sri Govardhan Peetham.

This math is situated in the region called Swargadwar, which is one of the main attractions of the town of Puri.