शून्यसे भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर विसङ्गतियाँ

श्रहरि:

 श्रीगणेशाय नम:

श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती

श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठ

  पुरी,  ओडिशा (भारत)

.

निज  सचिव

स्वामी श्रीनिर्विकल्पानन्दसरस्वती

.

ध्यान रहे; शून्यसे भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर निम्नलिखित विसङ्गतियाँ  सुनिश्चित हैं –

  1. न्यूनताकी ओर अभिमुख अवरोह क्रमसे उत्तराङ्ककी अपेक्षा पूर्वाङ्क सविशेष भावाङ्क होता है। अत 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर शून्यको भावाङ्क माननेकी विवशता होगी, जो कि आधुनिक गणितज्ञोंको अमान्य है।
  2. 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर अङ्कमूलकी सिद्धि असम्भव होगी। कारण यह है कि 1, 2, 3, 4 आदिके प्रवाहकी तरह – 1, -2, -3, -4….का प्रवाह असङ्ख्यपर्यन्त प्राप्त होगा। तथापि समुद्रके स्तर (तल) से नीचे या ऊपरके समान 0 से न्यून या अधिक कहनेकी अनिवार्यता होगी। अभिप्राय यह है कि अङ्कोंका उत्कर्षापकर्ष शून्यसापेक्ष ही मान्य होगा।

2 – 1 = 1, 3 – 1 = 2 आदि स्थलोंमें  ऋणफल  1 तथा 2 आदि  ऋणचिह्नित नहीं होते। तद्वत् 3 + 2 = 5, 4 + 2 = 6 आदि स्थलोंमें योगफल 5 तथा 6 आदि भी ऋणचिह्नित नहीं होते।

वस्तुत 2 – 3 = -1का अभिफ्राय ‘दो 3 से  एक अङ्क न्यून’ है, 1 – 2 = -1 का अभिफ्राय ‘ एक 2 से  एक अङ्क न्यून’ है; तद्वत् 0 – 1 = -1 का अभिफ्राय ‘0 एकसे एक अङ्क न्यून है ‘ ही सिद्ध है।

0 से एकादिकी न्यूनता सर्वथा असम्भव है। कारण यह है कि 20 – 11 में 0 से 1 का ऋण सर्वथा असम्भव ही है। इस स्थलमें दहाई स्थानापन्न 2 से 1 जिसका मान 10 है कर्षित करनेपर 10 से 1 का ऋण ही विहित है। अत: 0 – 1 = – 1 का अर्थ शून्यसे  एककी एक न्यूनता न होकर एकसे शून्यकी एक न्यूनता ही मान्य है।

  1. 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर 1, 2, 3 आदिके अतिरिक्त ऋणचिह्नित एकादि अङ्कोंकी भी स्वतत्र अङ्करूपमें मान्यता होगी।
  2. 0 से भी किसी अङ्क को न्यून माननेपर ‘मूले शून्यं विजानीयात्। शून्यं वै परं ब्रह्म।” (गणेशपूर्वतापिन्युपनिषत् 3.1) – ‘सर्व मूल शून्य परब्रह्मस्वरूप भावात्मक है”, ‘अशून्यं शून्यभावं तु “(तेजोबिन्दूपनिषत् 1.10)- ‘शून्य अभावात्मक नहीं है।”  आदि श्रौतसिद्धान्त बाधित होगा। जिसके फलस्वरूप अङ्काम्नाय दिशाहीन व्यापारतत्रमात्र सिद्ध होगा ।
  3. गणितज्ञोंका आकलन त्रुटिग्रस्त होगा, जिसके फलस्वरूप सम्बन्धित विज्ञान तथा कार्यक्षेत्र दिशाहीन विध्वंसक सिद्ध होगा।
  4. 0 – 1 = -1 को सैद्धान्तिक माननेपर ‘शिष्यते शेषसंज्ञः ” (श्रीमद्भागवत 10.3.25)- ‘अवशिष्ट भावकी शेषसंज्ञा है’, “अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् ” (बह्वचोपनिषत्) -‘अनात्मवस्तुओंका प्रतिषेध कर देनेपर उनका लयस्थान  अधिष्ठानस्वरूप एकमात्र परम तत्त्व ही शेष रहता है।’  इस वैदिकी परिभाषाका तिरस्कार होगा। जिसके फलस्वरूप गणित युक्तिविहीन उन्मत्तोंका अनर्गल प्रलापमात्र सिद्ध होगा।
  5. इकाईसे दहाई स्थानापन्न सङ्ख्याका, दहाईसे सैकड़ास्थानापन्न सङ्ख्याका, सैकड़ासे सहस्रस्थानापन्न सङ्ख्याका अर्थात् क्रमश: उत्तरोत्तर सङ्ख्याका मान अधिक मान्य है। 10, 200, 3000 आदि स्थलोंमें शून्य इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि क्रमसे सन्निहित है; अत: शून्यकी एकादिकी अपेक्षा न्यूनता तथा एकादिकी शून्यकी अपेक्षा अधिकता  सिद्ध है। अभिफ्राय यह है कि गणनाफ्रक्रममें  इकाई, दहाई, सैकड़ा,  हजार आदि स्थलोंमें  फ्रयुक्त शून्यका उत्तरवर्ती वामाङ्क एकादि होता है। वह ऋणचिह्नित नहीं होता और शून्यकी अपेक्षा अधिक ही होता है; न कि न्यून। शून्यसे किसी अङ्कको न्यून माननेपर उसमें शून्याभिव्यञ्जकताकी असिद्धि होगी।
  6.   3 – 1 = 2,   2 – 1 = 1, 1 -1 = 0 के अनुशीलनसे शून्यकी फ्रथमाङ्कता तथा एकसे एक अङ्क न्यूनता चरितार्थ है।
  7. 9 – 9 = 0 , 8 – 8 = 0, 7 – 7 = 0, 6 – 6 = 0, 5 – 5 =  0, 4 – 4 = 0, 3 – 3 =  0, 2 – 2 =  0, 1 – 1 =0 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है  कि शून्य स्वेतर एकादि किसी भी अङ्कसे उतने ही अङ्क पूर्व है। समानवाचोयुक्तिसे  0 – 0 = 0 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि शून्यसे शून्य शून्याङ्क न्यून है, अर्थात् शून्यके पूर्व कोई  अन्य  अङ्क नहीं है। 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर इस सिद्धान्तका बाध होगा, अङ्कोंके चरम मूलका अभाव होगा।
  8. (-3) + (- 3) = – 6  , (- 2) + ( -2) = – 4  , (- 1) + (- 1) = – 2  के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है  कि वस्तुत: ऋणाङ्कघटित अङ्कका शून्य पूर्ववर्ती अङ्क नहीं है। अत: 0  – 1 = – 1 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है  कि 1 शून्यका उत्तराङ्क है।
  9. यद्यपि उत्तराङ्ककी अपेक्षा एक न्यून पूर्वाङ्क होता है, यथा 3 की अपेक्षा एक न्यून 2 और 2 की अपेक्षा एक न्यून एक तथा एककी अपेक्षा एक न्यून शून्य होता है, अत: समानवाचोयुक्तिसे शून्यकी अपेक्षा एक न्यून कोई अपूर्व अङ्क होना चाहिए; परन्तु ऐसा न होकर शून्यकी अपेक्षा एक न्यून ऋणचिह्नित 1 माना जाता है; जबकि  एक शून्यसे एकाधिक है। शून्यसे शून्यका ऋण करनेपर प्राप्त शून्य इस तथ्यको सिद्ध करता है कि शून्यसे न्यून कोई अङ्क नहीं है। जिस प्रकार एकादिसे एकादिका ऋण करनेपर शेष 0 होता है, उसी प्रकार शून्यसे शून्यका ऋण करनेपर  शेष शून्य होता है; अर्थात् शून्य सबका शेष है। वह ऋण्य नहीं होता।  जब सैद्धान्तिक धरातलपर शून्यसे शून्यका ऋण भी सम्भव नहीं, तब उससे अधिक एकादिका ऋण उससे कैसे सम्भव है? सर्वथा असम्भव ही है। भाजकसे भाज्यकी तुल्यता या अधिकताके तुल्य ऋण्यसे ऋणककी तुल्यता या अधिकता ही प्रशस्त है। एकसे दोके ऋणका अर्थ दो से एककी एकन्यूनता ही सिद्ध है। तद्वत् शून्यसे एकादिके ऋणका अर्थ एकादिसे शून्यकी न्यूनता ही सिद्ध है।  शून्य निर्विशेषताकी अवधि है, अत: उसके सदृश या उससे न्यून निर्विशेषाङ्क अङ्काम्नायको असह्य है। “अनाद्यनन्तं शिष्यत्यममलं निरामयम्’ (योगकुण्डल्युपनिषत् 3.35) के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि अमल निरामय अनादि और अनन्त ही अन्तिम शेष है। निर्विशेषताकी अवधि ही काष्ठा और परा गति परम मूल है। 3 – 6 = – 3 के तुल्य 0 – 3 = –  3 औपचारिक है ।  यह तथ्य प्रसिद्ध है कि प्रौढिवाद (असैद्धान्तिक प्रकल्प) सिद्धान्तसहिष्णु नहीं होता।   – 3  + 3 =  0 के अनुशीलनसे यह  सिद्ध है कि ऋणचिह्नित 3 आदिमें 3 आदिका ही योग करनेपर शेष 0 रहता है।   -3 + 1 =- 2,  – 2 + 1 = -1,   -1 +  1 = 0 में,   +1 की क्षतिपूरकता सिद्ध है। अभिप्राय यह है कि कोई रुपयेसे रिक्त है, परिस्थितिवश उसे 3 रुपयेका  व्यय प्राप्त है। दैवयोगसे उसे एक रुपया सुलभ होता है। फिर भी दो रुपयेकी आवश्यकता उसे बनी ही  रहती है। उसकी इस स्थितिको गणितकी भाषामें अङ्कित करना है तो 0 – 3 + 1 = – 2 अथवा – 3 + 1 = – 2 लिखनेकी प्रथा है। इस व्यावहारिक पक्षके दिग्दर्शनसे शून्यसे किसी अङ्ककी न्यूनता सिद्ध नहीं होती। एक ओर जीरो पावरके बल्बको विद्युत् का अभिव्यञ्जक माना जाता है, दूसरी ओर शून्यको अभावात्मक भी माना जाता है। जीरो डिग्रीसे नीचे आदि कथनकी भी प्रसिद्धि है ही। अत: शून्यके वास्तव स्वरूपको लेकर आधुनिक विचारक परस्पर विरुद्ध मान्यताओंसे ग्रस्त हैं।

इस सन्दर्भमें यह ध्यान रखना आवश्यक है कि चरम मूल निर्विशेषताकी अवधि मान्य है और चरम कार्य सविशेषताकी अवधि मान्य है। वेदान्तवेद्य ब्रह्म निर्विशेषताकी अवधि है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धयुक्त पृथ्वी सविशेषताकी अवधि है। अवान्तर विशेषतासम्पन्न किन्तु अतिरिक्त विशेषताविहीन वृक्षादि पृथ्वीके तारतम्यज सङ्घात हैं। तद्वत्  अङ्कगणितमें अङ्कादि (अङ्कका मूल) शून्य निर्विशेषताकी अवधि है और अङ्कान्त (अङ्ककी अवधि) 9 चरम विशेषतासम्पन्न है; अर्थात् इकाईस्थानापन्न अङ्कोंमें सबसे अधिक है। दस (10) आदि शून्य तथा एकादिके स्थानान्तर उल्लास हैं। अत: शून्यसे न्यून किसी अङ्ककी स्वीकृति असिद्ध है।

जिस प्रकार 1/2 = 0.5 में एक दोका अभाज्य है, इस तथ्यका द्योतक ‘0.’ है  और प्रथम भाज्य 1 के पश्चात् दाशमलविक विधाके अनुसार प्राप्त 10 दोका भाज्य है, इस तथ्यका द्योतक ‘.5′ है; उसी प्रकार  0 – 1 = -1 में  शून्य एकका ऋण्य नहीं है, इस तथ्यका द्योतक  ‘-‘ है और शून्य एकसे एक न्यून है , इस तथ्यका द्योतक ‘1’ है। गणितमें सन्निहित व्यङ्ग्यार्थको दार्शनिक विधासे समझनेकी आवश्यकता है।

  1. 10 में 2 से भाग देनेपर भागफल 5 मध्यवर्ती अङ्क मान्य है।  5 के बाद क्रमशः 6, 7, 8, 9 तथा 10 की दृष्टिसे पाँच और 10 के मध्यमें  6, 7, 8, 9 संज्ञक चार अङ्कोंका व्यवधान है। एकको प्रथमाङ्क माननेपर एक और पाँचके मध्य क्रमशः 2, 3 ,4 तीन ही अङ्क सिद्ध हैं। जबकि शून्यको प्रथमाङ्क माननेपर 0 और 5 के मध्य क्रमशः 1, 2, 3, 4 संज्ञक चार अङ्कोंका अन्तराल सिद्ध है।  अत: शून्यको प्रथमाङ्क माननेपर पूर्वोक्त  विसङ्गतिका समाधान हो जाता है। तद्वत् 20 को 2 से, 30 आदिको 2 से भाग देनेपर पूर्वोक्त विधासे प्राप्त विसङ्गतिका समाधान  शून्यको प्रथमाङ्क माननेपर ही सम्भव है।
  2. शून्योत्तर क्रमशः एकाधिक 1 ,2 , 3, 4 , 5, 6, 7, 8, 9 आदिकी सिद्धिके बिना ऋणचिह्नित 1 ,2 , 3, 4 , 5, 6, 7, 8, 9 आदिकी सिद्धि सर्वथा असम्भव है। कारण यह है कि प्राप्तका ही प्रतिषेध होता है, न कि सर्वथा अप्राप्तका। अत: शून्योत्तर एकादिके बिना ऋणचिह्नित एकादिकी सिद्धि सर्वथा असम्भव है; वह केवल व्यङ्ग्यार्थ शैलीमें ही प्रयुक्त है।
  3. यद्यपि गणनाकी दृष्टिसे एक फ्रथमाङ्क मान्य है, तथापि दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 11 अमान्य है, जब कि 10 मान्य है। 10 में 0 इकाईस्थानापन्न है और 1 दहाई स्थानापन्न है। 1 + 9 = 10 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या एक और एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9 के योगसे दसकी सिद्धि सम्भव है। कदाचित् एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1 ही होती , तब  एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9 उससे नौ गुण अधिक होनेके कारण दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 11 से दो अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 99 ; तद्वत् तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 111 से तीन अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 999, नौ गुण अधिक होती। तुल्य ाढमकी अनुवृत्ति अग्रिम चरणोंमे भी चरितार्थ होती। परन्तु दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 10, तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 100 , चार अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 1000 मान्य है तथा तुल्पामसे अग्रिम विधा भी चरितार्थ है।

उक्त रीतिसे गणना क्रमसे 1 और स्थानक्रमसे 0 प्रथमाङ्क है। संलग्नता सिद्धान्तके अनुसार 10 दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या है , जो कि एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1 x  एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9 से 1 अधिक है। इसी प्रकार संलग्नता सिद्धान्तके अनुसार 100 तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या है , जो कि एक अङ्ककी सबसे  छोटी सङ्ख्या 1 x  दो अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 99 से 1 अधिक है। इसी प्रकार संलग्नता सिद्धान्तके अनुसार 1000 चार अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या है , जो कि एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1  तीन अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 999 से 1 अधिक है। तद्वत् (एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1 x  एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9) + 1 = 10, (दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 10 x एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9) + 10 =100, (तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 100 x एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9) + 100 = 1000 आदि क्रम भी चरितार्थ है।

 

  1. 0, 1, 2, 3 क्रमिक उत्कर्षके  और  3, 2 , 1, 0 क्रमिक अपकर्षके द्योतक हैं;  जबकि 0, -1, -2 , -3 आदि  क्रमिक अपकर्षके द्योतक हैं।  अत:  0, 1, 2, 3  क्रमिक उत्कर्षके द्योतकको  क्रमिक अपकर्षके द्योतकरूपमें   प्रस्तुत करनेके कारण शून्यसे भी न्यूनाङ्ककी प्रक्रिया गणितप्रस्थानमें वाममार्ग है।
  2. 0, 1, 2, 3 आदि आरोहाम जिस प्रकार ऋण विरहित भावात्मक है; उसी प्रकार 3, 2, 1, 0 यह अवरोहाम भी ऋणविरहित भावात्मक ही है। अत: ऋणचिह्न केवल अवरोहका द्योतक होनेके कारण ऋणचिह्नित एकादिकी शून्यसे उत्कृष्टता ही सिद्ध है।
  3. कहा जा सकता है कि उत्तराङ्कसे पूर्वाङ्क एक अङ्क न्यून होता है और पूर्वाङ्कसे उत्तराङ्क एक अङ्क अधिक होता है। ऐसी स्थितिमें शून्यसे एकका ऋण करनेपर प्राप्त  ‘-1 ‘ शून्यसे एक अङ्क न्यून है और 0+1=1 के अनुशीलनसे यह तथ्य  सिद्ध है कि एक शून्यसे एक अङ्क उत्तर है। अत एव  -1, -2, -3 आदि शून्यसे क्रमिक न्यूनाङ्क सिद्ध हैं।

परन्तु विचारणीय विषय यह है कि एकादिमें स्वयं एकादिसे ही योग करनेपर द्विगुण सङ्ख्याकी समुपलब्धि सुनिश्चित है। यथा;  1+1=2, 2+2=4, 3+3=6 आदि; जबकि 0+ 0 = 0 ही होता है। अत: शून्यसे ऋणचिह्नित एकादिकी क्रमिक पूर्वाङ्कता असिद्ध अर्थात् गौण है, न कि सिद्ध अर्थात् मुख्य। ‘मूलका मूल असिद्ध है’ – यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है। ‘मूले मूलाभावादमूलं मूलम् ‘(साङ्ख्यसूत्रम्  1.67 )-“मूलका मूल असम्भव है, अत अङ्कोंका मूल शून्य मूलरहित है।”

इस प्रकार; शून्यसे किसी अङ्ककी न्यूनता असिद्ध है।

.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

केरल में हुई गोहत्या के विरोध में जगद्गुरु शंकराचार्य

केरल में हुई गोहत्या के विरोध में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वतीजी का मधुपुर,झारखण्ड से राजनैतिक दलों को चुनोती…
मूर्तिभंजको के शासनकाल में श्रीजगन्नाथ आदि का दर्शन सुलभ नहीं था , भगवत्पाद शंकराचार्य महाभाग ने २५०० वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन अपने चिन्मय करकमलों से श्री जगन्नाथ आदि को पुनः प्रतिष्ठित किया !

बदरीवन में श्री बदरीनाथजी का दर्शन सुलभ नहीं था – जिन्होंने अपने चिन्मय करकमलों से बदरीनाथ जी को पुनः प्रतिष्ठित किया – भारत को पुनः वृहद् भारत का रूप जिन्होंने दिया – भारत को सुरक्षित , मठमंदिरों को सुरक्षित रखने के उन आदिशंकराचार्य ने क्या नहीं किया और बौद्धिक धरातल पर उन्होंने जो दर्शन दिया , भाष्य दिया उस पर पूरा विश्व ही नहीं , सारे वैज्ञानिक भी लट्टू है !

जिस प्रान्त में आदिशंकराचार्यजी ने जन्म लिया – उस प्रान्त के दीवाने , राजनैतिकदल के उद्दण्ड युवक घोषणा पूर्वक सबके सामने गाय को काटते है तो हम कैसे समझें भारत स्वतंत्र है , कोई भी हो , कोई राजनैतिकदल हो जिसे भारत में गोहत्या प्यारी है , उस राजनेता को , उस राजनैतिकदल पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए , उसे चुनाव लड़ने का ही नहीं भारत में रहने का अधिकार भी नहीं मिलना चाहिए , ऐसे अत्याचारियों को हम नहीं सह सकते !

और उलटी बात – गोभक्तो को गुण्डा कहा जाता है और और गोहत्यारों को राष्ट्रभक्त कहा जाता है !

जो राजनेता , जो नागरिक , जो राजनैतिकदल गुप्त या प्रकट रूप से गोहत्या का समर्थन करते है – उन्हें भारत की नागरिकता से वंचित करना चाहिए वह भारत का नागरिक नहीं देशद्रोही है , उन्हें भारतमें रहने का अधिकार नहीं !

अब हम उस नीति को जन्म देंगे – जहाँ शांतिपूर्वक , मानवाधिकार की सीमा में , जहाँ गोभक्तो की विजय होगी , गोवंश की रक्षा होगी , बंगाल में हमारे मानबिदुओं की रक्षा होगी !

भारत स्वतंत्र है क्या ??

भारत की शिक्षा पद्धति हमारी अपनी नहीं , रक्षा की प्रणाली हमारी अपनी नहीं , भारत में कृषि , गोरक्ष , वाणिज्य के प्रकल्प हमारे अपने नहीं , सेवा के प्रकल्प , उद्धोग के प्रकल्प हमारे अपने नहीं है और धीरे धीरे ब्राहमण , क्षत्रिय , वैश्य व् शुद्र के बीज भी अब हमारे अपने रहने वाले नहीं है , इससे घोर दासता , परतंत्रता और क्या हो सकती है !

आप यह मत समझिये कि हम मौन है , हम कौन है ?

एक समय हमने नारद के रूप में हिरन्यकशीपु को रसातल में पहुँचाने के लिए उसी के बेटे प्रहलाद को खड़ा किया , यह हमारी परंपरा है !

एक समय हमने भृगु महर्षि के रूप में बेन के आतंकपूर्ण शासन को उच्छिन्न करके पृथु को राजा बनाया था !

हम वो है जिसने वशिष्ठ के रूप में अत्याचारों को ख़त्म करने के लिए , रावण को रसातल में पहुँचाने के लिए भगवान् राम को प्रकट किया था !

हम वो है जो धौम्यऋषि के रूप में , मैत्रेयऋषि के रूप , वेद व्यासजी के रूप में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर को प्रकट करके कंस और दुर्योधन के शासन को रसातल में पहुँचाया , हमने चाणक्य के रूप में चन्द्रगुप्त को आगे करके अभिमानियो के शासन को उच्छिन्न किया !

आज भी व्यासपीठ में वह बल है , वह सामर्थ्य है !

मै फिर घोषणा करता हूँ जिसको गोहत्या प्यारी हो , वो किसी प्रान्त के मुख्यमंत्री हो , भारत का प्रधानमंत्री रहा हो या हो , मै नहीं जानता – अगर गोहत्या का कोई गुप्त या प्रकट समर्थक है – भारत को खाली करें , उसे भारत की नागरिकता नहीं मिलनी चाहिए , जो गति वह गायों को दे रहा है , वह गति उसे मिलनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो भारत गोभक्तो का होगा , गंगा के भक्तो का होगा , आर्यों का होगा , सैद्धांतिक तौर पर भारत की रक्षा होगी !

!! हर हर महादेव !!

 

पुरी शंकराचार्य श्री निरञ्जन देव तीर्थ जी महाराज

आप सन् १९६४ से १९९२ तक जगन्‍नाथपुरी के शंकराचार्य के पीठ पर आसीन रहे। आपको संन्‍यास की दीक्षा , स्‍वामी अभिनव सच्चिदानन्‍द तीर्थ‍ महाराज द्वारा प्रदान की गयी थी।
आपका जन्‍म ब्‍यावर राजस्‍थान निवासी श्री गणेशलाल द्विवेदी के यहां आश्विन कृष्‍ण १४ संवत् १९६७ को हुआ । प्रारम्भिक संस्‍कृत की शिक्षा के पश्‍चात् सम्‍पूर्णानन्‍द संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय से व्‍याकरण शास्‍त्री, व्‍याकरणाचार्य आदि की उपाधि प्राप्‍त की । इसके साथ ही काशी में रहते हुए आपने व्‍याकरण मीमांसा, वेदान्‍त दर्शन तथा न्‍यायशास्‍त्र का अध्‍ययन किया।
अध्‍ययन के पश्‍चात् पं० चन्‍द्रशेखर द्विवेदी नारायण संस्‍कृत कालेज पेटलाद में प्राचार्य पद पर नियुक्‍त हुए। आप पूज्य श्री करपात्री जी के विशेष अनुयायायी रहे तथा उनके द्वारा स्‍थापित अखिल-भारतीय-रामराज्‍य-परिषद् के मन्त्री पद पर भी आपने कार्य किया तथा श्री करपात्री जी के निर्देश पर ऋषिकुल ब्रहमचर्याश्रम हरिद्वार में दो वर्ष तक प्राचार्य रहे। इस अवधि में अनेकों यज्ञों का अनुष्‍ठान सम्‍पन्‍न किया । राजस्‍थान लोक सेवा आयोग से चयन के फलस्‍वरूप १९५५ से १९६४ तक महाराजा संस्‍कृत कालेज , जयपुर के प्राचार्य पद पर भी आसीन रहे । सन् १९६६ ,१९६७ के गोरक्षा आन्‍दोलन में आपने लगातार ७२ दिन का अनशन दिल्‍ली जेल में किया । हिन्‍दू कोड बिल तथा गौ हत्‍या विरोध आन्‍दोलन का भी आपने सफल नेतृत्‍व किया। आपने शास्‍त्र सम्‍मत सभी परम्‍पराओं का कट्टर समर्थन किया। आप धर्म आधारित व्‍यवस्‍था के प्रबल समर्थक थे एवं पाखण्ड के प्रबल विरोधी एक ऐसे पुण्यपुञ्ज थे , जिन्होंने सनातन वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार एवं संवर्द्धन में अपना पूरा जीवन लगा दिया।

जगद्गुरू शंकराचार्य की महान् परम्परा को गौरवान्वित करने वाले श्री निरञ्जन देव तीर्थ जी महाराज वास्तव में एक अलौकिक व्यक्तित्व के धनी महात्मा थे ।

।। जय श्री राम ।।

Adi shankaracharya(आदि शङ्कराचार्य)

Around 507 B.C. there descended on the sacred, deeply adorable soil of this holy land a personality extraordinary who by the sheer force of his matchless erudition, enlightened the whole world. He was none other than Acharya Adi Shankara, a very embodiment of Lord Shiva, tenth in the line of Guru traceable back to Sriman Narayana himself. He had dispelled one for all the thousand and one dark force that were hitting hard at the very foundation of Sanatana Dharma and flew aloft unshakably the banner of Sanatana Dharma, thus establishing its invulnerability once for all. As is anybody’s guess, all this he accomplished solely by his all-too-rare spiritual wisdom, luster and strength, in short, his spiritual process.

His holiness Adi Shankaracharya was born in Kaladi villege of Kerala.His father’s name was Shivaguru and mother’s name was Sati Aryamba. He was by cast Nambudaripad Brahmin. He was born on Yudhisthir Sambat 2631 in 507 B.C. on Vaishakha Sukla Panchami on Sunday. His thread ceremony took place at the age of 5 years. Taking his mother’s  blessings, he left hearth and home as a body  to take a life of Sanyasa initiated by Shree Govindapadacharya on the auspicious day in the Kartik month on Devothana Ekadashi. From the age of 5 to 8 years Acharya Shankara learnt deep studies on the Vedas, Vedanga, Dharma Shastra, Purana, History and Budhagama etc. According to Sanatana Dharma and Shiva Purana, Hindus call Adi Shankaracharya as reincarnation of Lord Shiva. According to Adi Shankaracharya philosophy all the four Peeth’s Acharya are known as Shankaracharya.

Acharya Shankara within a short span of sixteen years re-established Sanatana Dharma after overcoming not only Budhism and other directionless religions but also climes and languages and incarnation (Tantra Mantra). His holy body left in demise at the age of 32 years in the year 2663 says 475 B.C. on the holy day of Kartika Poornima.

पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगदगुरु शङ्कराचार्य भगवान के अमृतवचन

जिन देशों में ब्राह्मण और परिव्राजकों का आध्यात्मिक मार्गदर्शन सुलभ न होने के कारण तथा अभ्युदय तथा नि:श्रेयस के अनुरुप आचाररुप क्रियालोप के कारण सनातन जातिधर्म और कुलधर्म का लोप सहस्त्रों वर्ष पहले हो गया उन देशवासियों का अर्थ , कामपरायण होना तथा केवल बौद्धिक धरातल पर नैतिकता और देहातिरिक्त आत्मा के अस्तित्व में आस्थान्वित होना अथवा देहात्मवाद के वशीभूत होकर पश्वादितुल्य जीवन व्यतीत करना या मानवोचित शील , संयमादि से गिर कर अराजक हो जाना स्वाभाविक है । परन्तु भारत तथा नेपाल आदि में विद्वेष और अज्ञानवश विकास के नाम पर वेद , विप्र, सती-साध्वी-पतिव्रता , सत्यवादी, निर्लोभ और दानशील तथा धर्म , काम , अर्थ , मोक्षसाधक पृथ्वी के धारक सनातन मार्ग का योजनाबद्ध विलोप का अभियान चलाना मानवता के लिये कलंक तथा पृथ्वी के लिये अभिशाप है । स्कन्ध पुराण में पृथ्वी के धारक इन सातों का वर्णन आया है ।

गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभि: सत्यवादिभि: ।
अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धायते मही ।।

अर्थ :- गोवंश , विप्र , वेद , सती , सत्यवादी , निर्लोभ और दानशील – इन सातों के द्वारा पृथिवी धारण की जाती है ।

इन सातों के विलोप का योजनाबद्ध अभियान भारत में और नेपाल अादि में चलाना पृथ्वी के लिये अभिशाप और मानवता के लिये कलंक है ।

हर हर महादेव

जगतगुरु शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज

श्री ऋगवैदिय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के वर्तमान 145 वें श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज भारत के एक ऐसे सन्त हैं जिनसे आधुनिक युग में विश्व के सर्वोच्च वैधानिक संगठनों संयुक्त राष्टसंघ तथा विश्व बैंक तक ने मार्गदर्शन प्राप्त किया है | संयुक्त राष्टसंघ ने दिनांक 28 से 31 अगस्त 2000 को न्यूयार्क में आयोजित विश्वशांति शिखर सम्मेलन तथा विश्व बैंक ने वर्ल्ड फेथ्स डेवलपमेन्ट डाइलॉग- 2000 के वाशिंगटन सम्मेलन के अवसर पर उनसे लिखित मार्गदर्शन प्राप्त किया था | श्री गोवर्धन मठ से संबंधित स्वस्ति प्रकाशन संस्थान द्वारा इसे क्रमश: विश्व शांति का सनातन सिद्धांत तथा सुखमय जीवन सनातन सिद्धांत शीर्षक से सन् 2000 में पुस्तक रूप में प्रकाशित किया है | वैज्ञानिकों ने कम्प्यूटर व मोबाईल फोन से लेकर अंतरिक्ष तक के क्षेत्र में किये गये आधुनिक आविष्कारों में वैदिक गणितीय सिद्धांतों का उपयोग किया है जो पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारा रचित स्वस्तिक गणित नामक पुस्तक में दिये गये हैं । गणित के ही क्षेत्र में पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य जी महाराज की अंक पदीयम् तथा गणित दर्शन नाम से दो और पुस्तकों का लोकार्पण हुआ है, जो निश्चित ही विश्व मंच पर वैज्ञानिकों के लिए विभिन्न क्षेत्रों में नए आविष्कारों के लिए नए परिष्कृत मानदंडों की स्थापना करेंगे |

अपनी भूमिका से भारत वर्ष को पुन: विश्वगुरू के रूप में उभारने वाले पूज्यपाद जगद्गुरू श्री शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज का जन्म ७२ वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त के मिथिलाच्जल में दरभंगा (वर्तमान में मधुबनी) जिले के हरिपुर बख्शीटोलमानक गांव में आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी, बुधवार रोहिणी नक्षत्र, विक्रम संवत् 2000 तदानुसार दिनांक 30 जून ई | 1943 को हुआ | देश-विदेश में उनके अनुयायी उनका प्राकट्य दिवस उमंग व उत्साहपूर्वक मनाते हैं | पूज्य पिताजी पं | श्री लालवंशी झा क्षेत्रीय कुलभूषण दरभंगा नरेश के राज पंडित थे | आपकी माताजी का नाम गीता देवी था | आपके बचपन का नाम नीलाम्बर था |

आपकी प्रारंभिक शिक्षा बिहार और दिल्ली में सम्पन्न हुई है | दसवीं तक आप बिहार में विज्ञान के विद्यार्थी रहे | दो वर्षों तक तिब्बिया कॉलेज दिल्ली में अपने अग्रज डॉ | श्री शुक्रदेव झा जी की छत्रछाया में शिक्षा ग्रहण की पढ़ाई के साथ-साथ कुश्ती, कबड्डी और तैरने में अभिरूचि के अलावा आप फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी थे | बिहार और दिल्ली में आप छात्रसंघ विद्यार्थी परिषद के उपाध्यक्ष और महामंत्री भी रहे | अपने अग्रज पं | श्रीदेव झा जी के प्रेरणा से अपने दिल्ली में सर्व वेद शाखा सम्मेलन के अवसर पर पूज्यपाद धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज एवं श्री ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के पीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री कृष्णबोधाश्रम जी महाराज का दर्शन प्राप्त किया | इस अवसर पर उन्होंने पूज्य करपात्री जी महाराज को हृदय से अपना गुरूदेव मान लिया | तिब्बिया कालेज में जब आपकी सन्यास की भावना अत्यंत तीव्र होने लगी तब वे बिना किसी को बताये काशी के लिए पैदल ही चल पड़े | इसके उपरांत आपने काशी, वृन्दावन, नैमिषारण्य, बदरिकाआश्रम, ऋषिकेश, हरिद्वार, पुरी, श्रृंगेरी आदि प्रमुख धर्म स्थानों में रहकर वेद-वेदांग आदि का गहन अध्ययन किया | नैमिषाराण्य के पू्ज्य स्वामी श्री नारदानन्द सरस्वती जी ने आपका नाम ‘ध्रुवचैतन्य’ रखा | आपने 7 नवम्बर 1966 को दिल्ली में देश के अनेक वरिष्ठ संत-महात्माओं एवं गौभक्तों के साथ गौरक्षा आन्दोलन में भाग लिया | इस पर उन्हें 9 नवम्बर को बन्दी बनाकर 52 दिनों तक तिहाड़ जेल में रखा गया |

बैशाख कृष्ण एकादशी गुरूवार विक्रम संवत् 2031 तद्नुसार दिनांक 18 अप्रैल 1974 को हरिद्वार में आपका लगभग 31 वर्ष की आयु में पूज्यपाद धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के करकमलों से सन्यास सम्पन्न हुआ और उन्होंने आपका नाम ‘निश्चलानन्द सरस्वती’ रखा | श्री गोवर्धन मठ पुरी के तत्कालीन 144 वें शंकराचार्य पूज्यपाद जगद्गुरू स्वामी निरन्जनदेव तीर्थ जी महाराज ने स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती को अपना उपयुक्त उत्तराधिकारी मानकर माघ शुक्ल षष्ठी रविवार वि | संवत् 2048 तद्नुसार दिनांक 9 फरवरी 1992 को उन्हें अपने करकमलों से गोवर्धनमठ पुरी के 145 वें शंकराचार्य पद पर पदासीन किया | शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित होने के तुरन्त बाद आपने ‘अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा, देश की सुरक्षा और अखण्डता’ के उद्देश्य से प्रामाणिक और समस्त आचार्यों को एक मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए राष्ट रक्षा के इस अभियान को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान कराने की दिशा में अपना प्रयास आरंभ कर दिए | राष्टरक्षा की अपनी राष्ट व्यापी योजना को मूर्तरूप दिलाने हेतु उन्होंने देश के प्रबुद्ध नागरिकों के लिए ‘पीठ परिषद’ और उसके अन्तर्गत युवकों की ‘आदित्य वाहिनी’ तथा मातृशक्ति के लिए आनन्द वाहिनी के नाम से एक संगठनात्मक परियोजना तैयार की | इसमें बालकों के लिए ‘बाल आदित्य वाहिनी’ एवं बालिकाओं हेतु बाल आनंद वाहिनी की व्यवस्था भी की गई | पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज ने चैत्र शुक्ल नवमी शनिवार विक्रम संवत् 2049 तद्नुसार दिनाकं 4 अप्रैल सन् 1992 को रामनवमी के शुभ दिन पर श्री गोवर्धनमठपुरी में ‘पीठ परिषद’ और उसके अंतर्गत ‘आदित्य वाहिनी’ का शुभारंभ करवाया | कलियुग में संघ के शक्ति सन्निहित हैं | धर्म, ईश्वर और राष्ट से जोड़ने का कार्य संघ द्वारा सम्पन्न हो, यह आवश्यक है |

पूज्यपाद जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी द्वारा स्थापित पीठ परिषद और उसके अंतर्गत आदित्य वाहिनी एवं आनन्द वाहिनी का मुख्य उद्देश्य ‘अन्यों के हित का ध्यान रखते हुए हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा, देश की सुरक्षा और अखण्डता’ है | पूज्यपाद महाराज श्री का अभियान मानव मात्र को सुबुद्ध, सत्य सहिष्णु और स्वावलम्बी बनाना है | उनका प्रयास है कि पार्टी और पन्थ में विभक्त राष्ट को सार्वभौम सनातन सिद्धान्तों के प्रति दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक धरातल पर आस्थान्वित कराने का मार्ग प्रशस्त हो | उनका ध्येय है कि सत्तालोलुपता और अदूरदर्शिता के वशीभूत राजनेताओं की चपेट से देश को मुक्त कराया जाये | बड़े भाग्यशाली हैं वे लोग जिन्हें विश्व के सर्वोच्च ज्ञानी के रूप में प्रतिष्ठित इन महात्मा द्वारा चलाये जा रहे अभियान में सहभागी बनने और जिम्मेदारी निभाने का सुअवसर मिला हुआ है | परमपूज्य गुरूदेव के चरणों में कोटिश: नमन तथा चन्द्रमौलीश्वर भगवान से दीर्घायुष्य एवं आसेम्यता के लिए प्रार्थना है |

Glory of His Holiness Shrimad Jagadguru Lord Adi Shanakacharya .

शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम् ।

सूत्र-भाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुन: पुन: ॥

Shankara the Avtaar of Shiva and Badrayana VedaVyasa the Avtaar of Vishnu both have created and written commentry on vedic scriptures . I pay my regards & dedicated devotion to both of the lords .

Glory of His Holiness Shrimad Jagadguru Lord Adi Shanakacharya .

The major role in refining & giving the reorganized structure to sanatan dharma by the divine and supreme efforts is done by His Holiness Adi Shankara . During 2500 years before those who have departed themselves from sanatan dharma and created their own sect for name , fame , power they on the basis of condeming the vedic scriptures and spreading the illusions against vedas wants to extend their sect . In such condition the whole ” Bharata ” got trapped in controversies , clashes , collisions between sects . The vedic sects Shaiva , vaishnav , shakta , ganapatya , surya are divided because of their various ritual differences they are unable to resist these illusions which are being spreaded by non-vedics against vedas. Non-Vedic sects have started convertion in hinduism through propoganda against vedas . During such cruscial and against circumstances Lord Shiva has taken incarnation ( Avtaar ) as lord jagadguru Adi Shanakacharya in order to reunite sanatan dharma and to re-establish it . Adi Shankara taken avtaar in kalady kerela at the time period 507 B.C. in the scholar bramhin family in the home of Shivaguru Bhairava datta father and mother Sati Aryamba mother of Adi Shankara. Shankara mastered on vedas upto age of childhood when he was 8 years old . At the age of 9 years Adi Shankara leaved home and taken sanayasa by guru govindapada on the bank of river narmada . In the age of 12 & upto 16 years Shankara has written commentary on upanishads , bramhasutras and bhagvada gita. After the age of 16 years Adi Shankara has started his journey known as ” Shankara Digvijay ” around the country . Shankara challenged the non-vedics to debate with him on scriptures and vedas . Shankara has proved himself and vedic scriptures as immortal and universal all time correct in his debate and shankara proved himself immortal and victorious in his debate by defeating the non-vedic. After the nationwide victory in debate on vedas Adi Shankara has established the vedic monastries in four parts of bharat which is also known as amanaya peethas and shankaracharya mathas and given each vedic monastaries a particular veda and given these amanaya peethas responsibilities to always secure the particular veda . Adi Shankacharya after establishing amanaya peethas created the monk order under these peethas which is known as ” Dashnami’s ” . The Dashnami’s under these peethas given responsibility by Adi Shankara in order to secure holi vedas in all the holy cities , mountains , coastal sea areas , gurukuls , ashrams , jungles , forest . After then Lord Adi Shankara has refined the law and Administration and governance which was conducted by empires and kingdomship at that time . Lord Adi Shankara has given the throne of united india to the vedic king Sudhanva and established the vedic empire in united india . After giving the reorganized structure to Sanatan Dharma lord Adi Shankara completed his avtaar and returned to his abode the Holy Kailash . Jai Jai Shankara Hara Hara Shankara .

 

चांदीपुर संगोष्ठी

समुपस्थित समादरणीय सन्तवृन्द,

विद्वद्वृन्द, भक्तवृन्द एवं भक्तीमती माताओं,

आप महानुभावों ने अद्भुत अपनत्व, आस्था, उत्साह और आह्लादपूर्वक इस संगोष्ठी का समायोजन किया है श्रीविनयजी टुल्लू जी आदि जिन महानुभावों का इस संगोष्ठी के समायोजन और संचालन में गुप्त अथवा प्रकटयोगदान है, भगवान श्री चन्द्रमौलीश्वर की अनुकम्पा के अमोघप्रभाव से उनका सर्वविध उत्कर्ष हो,ऐसी भावना है। यह जो संस्थान है, विश्व के लिए मार्गदर्शक और वरदानस्वरुप सिद्ध हो ऐसी भावना है।

 

सज्जनों ! वेद सम्पूर्ण विश्व में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी ऋग्वेदादि का महत्व स्वीकार किया है। इस रॉकेट, कम्प्यूटर, एटम और मोबाईल के युग में भी वेदों की उपयोगिता यथावत् चरितार्थ है। समग्र ज्ञान-विज्ञान का स्रोत ऋगादि वेद हैं। वेदों की व्याख्या उसके रस-रहस्य का स्वरुप महाभारत में अंकित किया गया है। भगवान श्रीकृश्णद्वैपायन वेदव्यास, जोकि महाभारत के रचयिता हैं, उन्होंने डंके की चोंट से यह तथ्य ख्यापित किया कि जो कुछ महाभारत में है, इसके प्रचार-प्रसार के कारण अन्यत्र भी हो सकता है, लेकिन जो कुछ महाभारत में नहीं है, वही कहीं भी नहीं हो सकता । अतः सबकुछ महाभारत में सन्निहित है। वेदों के सन्दर्भ में भगवान मनु का उद्घोष है “भूतम् भव्यम् भविष्यम् च सर्वं वेदादि भविष्यसि“ जो कुछ काल की सीमा में सन्निहित तत्व या पदार्थ हैं उन सबका अधिगम विज्ञान वेदों के द्वारा सम्भव है। वेदों का बीज प्रणव या ओंकार है। ओंकार की महिमा प्रकारान्तर से वेदों की ही महिमा मान्य है। माण्डूक्य उपनिषद का उद्घोष है- “यद्यद् त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव”“ जो कुछ कालगर्भित है और यहां तक कि कालातीत है, काल की पकड़ और पहुंच से पर है, उसका अधिगम या विज्ञान भी वेदों के द्वारा सम्भव है। आयुर्वेद हो, धनुर्वेद हो, वास्तुविज्ञान हो, सबका उद्गम स्थान ऋगादि वेदों को ही माना गया है। आधुनिक विज्ञान को जानने वाले आप जैसे वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि विज्ञान के मूल में गणित सन्निहित है। परन्तु यजुर्वेद, ऋग्वेद आदि ने सर्वप्रथम दशमलव पद्धति को उद्भाषित किया जिसमें सिस्टम योग कहते हैं वो वेदों की देन है। आजकल बायनरी सिस्टम के माध्यम से समग्र संख्या को एक और शून्य में सन्निहित किया जाता है, यह जो दशमलव पद्धति है, उसकी उद्भावना वैदिक महर्षियों द्वारा ही की गई है। वेद का अर्थ स्वयं की ज्ञान और विज्ञान होता हैं अतः दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातल पर इस रॉकेट, कम्प्यूटर, एटम और मोबाईल के युग में भी वेदविहीत विज्ञान की उपयोगिता सिद्ध है। मैं संकेत करता हूं। कोई भी वैज्ञानिक क्यों न हों, इंजीनियर क्यों न हो, यदि उन्हें भगवान की शक्ति जो कि प्रकृति है, जिन्हें माया भी कहते हैं, उसके द्वारा प्रदत्त पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन, आकाश सुलभ न हों, तो वैज्ञानिकों की स्थिति क्या हो ? जितना भी आविष्कार होता है, अनुसंधान होता है, उसके मूल में तो भगवान की शक्ति, प्रकृति के द्वारा प्रदत्त पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन और आकाश ही सिद्ध होते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृश्णचन्द्र का वचन है-

मयाध्यक्षेण   प्रकृति:      सूयते    सचराचरम्।

हेतुनानेन    कौन्तेय     जगद्विपरिवर्तते।।

-(श्रीमद्भगवद्गीता 9.10)

साथ ही साथ वैज्ञानिकों को जो देह, इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरण की प्राप्ति भी है, जिनके माध्यम से चेतन जीवकला की अभिव्यक्ति होती है, यदि वैज्ञानिकों को वे सुलभ न हों, तो उनका अस्तित्व भी कैसे सिद्ध हो । इसका अर्थ यह है- भगवान की जो चमत्कारपूर्ण कृति या सृष्टि है, उसी का आलम्बन लेकर हम कुछ वैज्ञानिक अनुसंधान कर पाते हैं , आविष्कार कर पाते हैं। हमारे वैदिक महर्षियों ने जिन तथ्यों को उद्भाषित किया, कालान्तर में न्यूटन इत्यादि वैज्ञानिकों ने उन्हीं का किंचित अंशमें विश्व के सामने प्रस्तुत किया । पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन, आकाश में जो स्वभावसिद्ध सिद्धान्त सन्निहित हैं, जब कोई व्यक्ति उनका दर्शन कर पाता है, तब उसको वैज्ञानिक कहा जाता है। और एक विचित्र तथ्य है कि यंत्र के मूल में तंत्र होता है और तंत्र के मूल में मंत्र होता है। मंत्र के बिना तंत्र की तंत्र के बिना यंत्र की सिद्धि नहीं होती। कोई भी आप यंत्र लीजिए – उसे कैसे बनाया जाता है ? उसके मूल में प्रोसेस, मेथड, प्रक्रिया या कोई तंत्र होता है। और तंत्र किसको कहते हैं ? जो मंत्र को व्यावहारिक रुप देने का प्रक्रम है उसी का नाम तंत्र होता है। मन्त्र का अर्थ होता है- सिद्धान्त । प्रकृति में सन्निहित सिद्धान्त को कोई वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा के बल पर जान लेता है तब उस सिद्धान्त को यंत्र तक पहुंचाने के लिए वो जो मेथड, प्रोसेस या प्रक्रिया अपनाता है, उसी का नाम तंत्र है। तो यंत्र के मूल में तंत्र और तंत्र के मूल में मंत्र यह विज्ञान का स्रोत है।

साथ ही साथ यह विचार करने की आवश्यकता है की यन्त्र अपने आप में एक कार्य है। किन्तु उसके द्वारा विविध वस्तुओं के उत्पादन का प्रयोजन सन्निहित है ।

मन्त्र के माध्यम से वस्तु की उपलब्धि होती है, वस्तु का निर्माण होता है। तो मन्त्र को बनाने की प्रक्रिया क्या होती है और यन्त्रों के माध्यम से कार्यों के सम्पादन की प्रक्रिया क्या  होती है। दोनों प्रक्रियाओं का जब विज्ञान होता है तब कोई व्यक्ति वैज्ञानिक माना जाता है। सबसे उंचा वैज्ञानिक कौन हो सकता है ? इस पर विचार करें। मुण्डक उपनिषद में एक दृश्टांत दिया मकड़ी का । मकड़ी से आप सब परिचित हैं। वह जाला बनाती है और जाला बनाने की सामग्री भी अपने अन्दर संजोकर रखती है। जाला बनाने वाली भी वह होती है और जाला बनने वाली भी वही होती है। जाला बनाने की सामग्री भी वह अपने अन्दर संजोकर रखती है। एक चमत्कृति, एक बहुत बड़े इंजीनियर के रुप में हम मकड़ी को चुन सकते हैं। उसमें क्या चमत्कृति है ? प्रकृति प्रदत्त निसर्गसिद्ध चमत्कृति मकड़ी के जीवन में है। जाला को केवल बनाती ही नहीं है जाला बनाने की सामग्री भी अपने अन्दर संजोकर रखती है। साथ ही साथ एक सिद्ध योगी जो संकल्प के बल पर व्याघ्र बन जाता है। संकल्प के बल पर जो  व्याघ्र बन जाता है वो सिद्धयोगी का नाम है योगव्याघ्र। योग की शक्ति से निर्मित व्याघ्र। उस व्याघ्र को बनाने वाला भी वह सिद्धयोगी होता है। और व्याघ्र बनने वाला भी वह सिद्धयोगी होता हैं। तो सबसे उंचा वैज्ञानिक और इंजीनियर कौन होता है जो स्वयं ही मेकर और स्वयं ही मेटर होता है। उससे बड़ा कौन होगा। ऐसी विज्ञान की चमत्कृति हमारे आपके जीवन में प्रायः प्रतिदिन आती है स्वप्नावस्था में। सपना-हम आप देखते हैं। स्वप्न की अगर समीक्षा की जाए सज्जनों तो स्वप्न क्या है ? स्वप्नावस्था में हम आप जीव जो होते हैं, उनमें हम जीवों में ऐसी क्षमता आ जाती है जितने स्वप्न में स्थावर जंगम प्राणी दिखाई पड़ते हैं और उनके पोषक तथा उद्गमस्थान पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन, आकाश परिलक्षित होते हैं उन सबके रचयिता उन सबके साक्षी जीव ही होता है । अगर विज्ञान का स्रोत समझना हो, सबसे उंचे वैज्ञानिक का दर्शन करना हो, तो अपने स्वप्नावस्था का अनुशीलन करना चाहिए। हम स्वयं ही स्वप्नावस्था में सबसे उंचे वैज्ञानिक हो जाते हैं। इसका मतलब जो स्वप्न में तरु लता गुल्म इत्यादि स्थावर प्राणी परिलक्षित होते हैं और चींटी, चिड़िये, मनुष्य इत्यादि जंगम प्राणी जो परिलक्षित होते हैं उनके अभिव्यंजक और पोशक संस्थान के रुप में स्वप्नावस्था में पृथ्वी, पानी, प्रकाश, पवन, आकाश का हमको दर्शन होता है। उन सबका निर्माता कौन होता है ? सच्चिदानन्दस्वरुप सर्वेश्वर का अंशसरीखा जीव अर्थात् हम-आप कौन होते हैं। लेकिन विचार करने की आवश्यकता है स्वप्नावस्था में इतनी दिव्य शक्ति हमारे जीवन में आती कैसे है ? उस समय भी तो हम जीव  हैं। लेकिन इस समय उस प्रकार की चमत्कृति हमारे आपके जीवन में नहीं है जिस प्रकार की चमत्कृति हमारे आपके जीवन में स्वप्नावस्था में व्यक्त होती है। उसका कारण क्या है ? ये जो स्थूल शरीर है जो एक दिन शव के रुप में परिलक्षित होता है इस स्थूल शरीर से उपर भगवान अनुग्रहपूर्वक हमको पहुंचा देते हैं स्वप्नावस्था में ।  और कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों की गति भी स्वप्नावस्था में नहीं होती हैं। कर्मेन्द्रियां सो जाती हैं, ज्ञानेन्द्रियां सो जाती हैं,  आत्मचेतन से अधिष्ठित अर्धनिद्रित मन वासना और संकल्प की प्रगल्भता से उर्जायुक्त होकर सकल स्वप्न पदार्थों का रचयिता बन जाता है। स्वप्नावस्था में जो कुछ पदार्थ हमको दिखाई पड़ता है वह सब संकल्पात्मक होता है। स्वप्न टूटने पर, कल्पना कीजिए स्वप्नावस्था में आग लग गई और करोड़ों व्यक्ति हमको दिखाई पड़ते थे, वो भस्म हो गये। लेकिन स्वप्न टूटने पर राख का इतना अंशदिखाई पड़ेगा क्या ? वस्तुतः क्या है ? स्वप्नावस्था में हमारे आपके मन में ऐसी उर्जा या शक्ति का सन्निवेष हो जाता है सकल स्वप्न प्रपंच के रुप में स्वप्न साक्षी तैजस अपने आपको व्यक्त कर लेता है। यह हमने विज्ञान की आधारशिला पर सांकेतिक प्रवचन किया । यह जो स्थूल शरीर है उसमें तादात्म्यापत्ति, अहंता, ममता के कारण हमारी शक्ति सीमित हो जाती है । स्वप्नावस्था में भगवान की कृपा से इस स्थूल शरीर से जब उपर हमारी प्रज्ञाशक्ति उठ जाती है , हममें आपमें इतनी शक्ति आ जाती है कि सकल स्वप्नप्रपंच के स्रष्टा बन जाते हैं । एक विशिष्ट उत्कृष्टतम वैज्ञानिक के रुप में हमारी अभिव्यक्ति होती है। गाढ़ी नींद भी हमारे आपके सामने है । उस समय तो सूक्ष्म प्रपंच कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अन्तःकरण, प्राण, इनसे भी उपर हमारी स्थिति हो जाती है उस समय न कर्मेन्द्रियों का भान होता, न ज्ञानेन्द्रियों का भान होता है न प्राणों का भान होता है न मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार की गति सुषुप्ति गाढ़ी नींद में होती है । उस समय क्या दिव्यता हमारे जीवन में आ जाती हैं, क्या सिद्धियां हमारे जीवन में आ जाती हैं ? स्वप्नावस्था में मृत्यू के भय की पहुंच हम आप तक नहीं होती । सर्वानुभूति है- हिन्दू, मुसलमान, क्रिष्चियन, सब इस मत को मानते हैं। चींटी, चिड़िए को भी गाढ़ी नींद आ जाए तो गाढ़ी नींद में, सुषुप्ति अवस्था में किसी भी द्वंद्व की, सर्दी की, गर्मी की, भूख की, प्यास की हम तक पहुंच नहीं होती। कितनी उंची सिद्धि हो गई । यहां तक कि मरणासन्न व्यक्ति को भी दो क्षणों के लिए गाढ़ी नींद या सुषुप्ति प्राप्त हो जाए, उसे मृत्यु का भय प्राप्त नहीं हो सकता । मृत्यु से पारंगत, मृत्यु से अतीत जीव की प्राप्ति हमको गाढ़ी नींद में होती है। जिसको हम सुषुप्ति कहते हैं। सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास जो भी द्वंद्व है, उन द्वंद्वों की पहुंच हम आप तक नहीं होती हैं। यहां तक कि काम, क्रोध, लोभ, मोह ये जितने मनोविकार हैं, इन सबकी पहुंच हम आप तक गाढ़ी नींद या सुषुप्ति में नहीं होती । साथ ही साथ वेदना, ताप या दुख की गति भी हम आप तक सुषुप्ति में नहीं है। इसका अर्थ क्या हुआ सज्जनों ! अपने जीवन की गतिविधि पर विचार करें तो जाग्रत की अपेक्षा स्वप्न में हमको अधिक शक्तियां प्राप्त होती हैं, सिद्धियां प्राप्त होती हैं और उसी सुषुप्ति अवस्था में उससे भी अधिक उंची सिद्धि की प्राप्ति होती है। कहीं समाधि की सिद्धि प्राप्त हो जाये, ईश्वरतत्व, भगवद्तत्व या ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार हो जाये, तब क्या स्थिति होगी सज्जनों ? तब ये स्थिति होगी कि मृत्यु, अज्ञता और दुख तीनों का बीज भी सदा के लिए दग्ध हो जायेगा। तो समग्र विज्ञान का अन्तरभाव जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति और समाधि में वेदों ने इन अवस्थाओं का अंकन करके समग्र सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति संहृत्ति या संहार का विज्ञान प्रस्तुत किया है । एक वृक्ष को आप देखते हैं। कोई ऐसी शक्ति है जो समय पर उन वृक्षों में पत्तियों को लगा देती हैं। समय पर पत्तियों का पोषण करती है और समय आने पर पतझड़ की स्थिति आ जाती है। उत्पादनीय शक्ति और पालनीय शक्ति, संहारशक्ति वृक्ष में काम करती है। जब तक वृक्ष जीवित रहता है, प्राणस्पन्दन से युक्त रहता है तब तक तीन प्रकार की शक्तियां उनमें सन्निहित होती हैं। पत्तियों को उत्पन्न करने वाली शक्ति, समय पर पत्तियों को उत्पन्न कर देती हैं। उसी प्रकार उसे विकसित करने वाली शक्ति, पत्तियों का पोषण करती रहती है और अन्त में परिपुष्ट पत्तियों को एक ऐसी शक्ति है, जो गिरा देती है। तो विज्ञान के भी तीन प्रकल्प हैं- उत्पादक, पालक और संहारक। जहां आप बैठे हैं वहां जिन अस्त्रों का प्रयोग होता है वह क्या है ? संहार शक्ति की प्रधानता से यह वैज्ञानिक विभाग। कोई रक्षण शक्ति की प्रधानता से वैज्ञानिक विभाग होता है। कोई उत्पादन शक्ति की प्रधानता से वैज्ञानिक प्रकल्प होता है। सबसे बड़े वैज्ञानिक भगवान हैं। समग्र जगत की उत्पत्ति करते हैं। समग्र जगत का पालन करते हैं और समग्र जगत का संहार भी कर लेते हैं। वो भगवान की चमत्कृति क्या है ? इस पर हम विचार करते हैं। सावधान! यह माईक नामक यंत्र है। किसी ज्ञानवान, इच्छावान प्रयत्नवान, चेतन मेकेनिक यांत्रिक ने लोहा और प्लास्टिक नामक मैटर को माईक नामक रुप प्रदान किया होगा। कार्य की सिद्धि के मूल में तीन सिद्धान्त काम करता है, कार्य के मूल में इच्छाशक्ति चाहिए । बिना ईच्छाशक्ति के कार्य की निश्पत्ति नहीं हो सकती । इच्छाशक्ति के मूल में ज्ञान चाहिए । जानाति-इच्छति-करोति। किसी भी कार्य का हमको सांगोपांग ज्ञान होता है। फिर इच्छाशक्ति का उदय होता है फिर क्रियाशक्ति के द्वारा कार्य की निष्पत्ति होती है। किसी ज्ञानवान, इच्छावान प्रयत्नवान, चेतन मेकेनिक ने इस लोहा और प्लास्टिक नामक मैटर को माईक नामक यंत्र प्रदान किया । सावधान ! जिस यांत्रिक मेकेनिक ने लोहा और प्लास्टिक नामक उस मेटर, धातु या पदार्थ को इस माईक नामक यंत्र का रुप प्रदान किया । उसमें माईक बनाने की क्षमता सन्निहित थी, माईक बनने की क्षमता सन्निहित नहीं थी। और जिस लोहा और प्लास्टिक नामक धातु, मेटर या पदार्थ ने इस माईक नामक यन्त्र का रुप धारण किया उसमें माईक बनाने की क्षमता सन्निहित थी, माईक बनाने की क्षमता सन्निहित नहीं थी। इसी प्रकार से मैं संकेत करना चाहता हूं, वेदों के प्रति जो पूर्ण आस्थान्वित विचारक नहीं हैं, या दर्शन नहीं है, उनके द्वारा भी ईश्वर की सिद्धि होती है। वह ईश्वर जगत बना सकता है , जगत बन नहीं सकता। लेकिन वेदसम्मत, वैदिक ईश्वर की क्या चमत्कृति है, वेदों में पूर्ण आस्थान्वित दार्शनिकों ने जिस ईश्वर को उद्भाषित किया है, उसकी क्या क्षमता है ?

इसका अर्थ वह स्वयं को ही आकाश के रुप में व्यक्त करता है हमारे ईश्वर आकाश बनाने वाले भी और आकाश बनने वाले भी। वायु बनाने वाले भी और वायु बनने वाले भी। तेज बनाने वाले भी और तेज बनने वाले भी, जल बनाने वाले भी और जल बनने वाले भी । पृथ्वी बनाने वाले भी और पृथ्वी बनने वाले भी। पार्थिव जितना भी कार्यप्रपंच है उसके बनाने वाले भी और बनने वाले भी । कारण से कार्य की निष्पत्ति होती है उसका भी विज्ञान है । सावधान ! ये वैदिक विज्ञान है। आकाश- ये सबसे सूक्ष्म भूत है। आर्किमेडीज के समय तक ये वैज्ञानिकों को आकाश का पता नहीं था। अब धीरे धीरे आकाश का अस्तित्व मानने लगे हैं। हमारे यहां जो चार्वाक दर्शन है उसके अनुसार आकाश का अस्तित्व ही नहीं मान्य है। लेकिन जो उत्तम कोटि के वैज्ञानिक और दार्शनिक हैं जो आकाश का अस्तित्व मानते हैं, उपर आकाश है और नीचे पृथ्वी अपेक्षाकृत स्थिर है तो गतिशील जल, तेज और वायु की स्थिति है। नीचे पृथ्वी साधे न रहे, उपर आकाश स्थिर न रहे तो जल, तेज और वायु जो गतिशील् हैं, इनको थामने वाला, साधने वाला कोई न हो। कारण से जो कार्य की निष्पत्ति होती है, उसका सिद्धान्त क्या होता है ? सन्निकट सर्वषेश का नाम कार्य होता है और सन्निकट निर्विषेश का नाम कारण होता है। थोड़ा विचार कीजिए। पृथ्वी में हमको शव्द, स्पर्श, रुप, रस, गंध- ये पांचों रुपों का दर्शन होता है। पृथ्वी में शव्द भी है, स्पर्श भी है, रुप भी है, रस भी है, गंध भी है। लेकिन जल की ओर बढ़े ंतो, जल में स्वभावतः गंध नहीं है। विषेशता कम हो गई तो कारण की सिद्धि हो गई। विषेशता बढ़ गई तो कार्य की सिद्धि हो गई । तत्वों की गणना को कहां जाकर विश्राम दें। केमेश्ट्री वाले, फिजिक्स वाले आजकल तत्वों की संख्या बताते हैं। लेकिन प्रष्न उठता है, कहां जाकर तत्व विराम को प्राप्त होते हैं। मैं उदाहरण देता हूं- -गुलाब इत्यादि पुष्पों से बनी हुई सामने ये माला । इस माला में कोई छठा गुण नहीं है। पृथ्वी में पांच गुण है। आकाश की ओर से शव्द प्राप्त है, वायु की ओर से स्पर्श प्राप्त है, तेज की ओर से पृथ्वी को रुप प्राप्त है, जल की ओर से पृथ्वी को रस प्राप्त है और स्वयं पृथ्वी को गंध प्राप्त है। पृथ्वी में पांच गुण हैं। पृथ्वी का कार्य यह पुष्प है। पुष्पों से निर्मित यह माला है। इस माला में और माला जिन पुष्पों से बनी है, उनमें कोई छठा गुण नहीं है। जहां गुण में वृद्धि रुक जाती है वहां एक वैदिक सिद्धान्त है, वह अन्तिम चरम कार्य है। पृथ्वी से नीचे कोई कार्य क्यों हम स्वीकार नहीं करते ? सांख्यवादी नहीं स्वीकार करते, योगी नहीं स्वीकार करते, वेदान्ती क्यों नहीं स्वीकार करते, क्योंकि विषेशता में वृद्धि जब रुक जाती है, तो हम समझते हैं अन्तिम तत्व है, पृथ्वी हमारे यहां अन्तिम भूत क्यों है ? क्योंकि छठवें गुण से संपन्न किसी कार्य का सम्पादन पृथ्वी के द्वारा नहीं हो सकता । लेकिन थोड़ा उपर चलें। कार्य और कारण का विज्ञान कैसे होगा ? पृथ्वी में पांच गुण हैं, तो जल में चार ही गुण होंगे। स्वभावतः जल में गंध नहीं है और तेज में रस भी नहीं है। शव्द, स्पर्श, रुप तीन ही गुण होते हैं। और आगे चलें, वायु में शव्द और स्पर्श दो ही गुण होते हैं। आकाश में स्पर्श भी नहीं होता, शव्द ही होता है। लेकिन उस आकाश का मूल कौन हो सकता है ? जिसमें शव्द नामक गुण भी न हो, शव्द की बीजावस्था हो। उसी का नाम प्रकृति, उसकी का नाम अव्यक्त है। और ब्रह्मतत्व, भगवद्तत्व या परमात्मतत्व किसे कह सकते हैं, जिसमें वह बीजावस्था भी न हो। उदाहरण देते हैं। कृषि विज्ञान को ले लीजिए। एक है बीज और एक है भूमि,पृथ्वी। दोनों में क्या अन्तर है ? बीज में अंकुर इत्यादि उत्पन्न करने की वासना, उसमें क्या है, संस्कार सन्निहित है। अगर वो संस्कार का लोप होता है, बीज को दग्ध कर दें, उसमें घुन लग जाये, बीज फिर पृथ्वी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाएगा।

जगदगुरु शंकराचार्य श्री स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज-जीवन परिचय

स्वामी भारती कृष्णतीर्थ जी महाराज (14 मार्च 1884 – 2 फ़रवरी 1960) जगन्नाथपुरी में श्री ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के 143 वें शंकराचार्य थे। शास्त्रोक्त अष्टादश विद्याओं के ज्ञाता, अनेक भाषाओं के प्रकांड पंडित तथा दर्शन के अध्येता पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्णतीर्थ जी महाराज ने वैदिक गणित की खोज कर समस्त विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया था। वे एक ऐसे अनूठे धर्माचार्य थे जिन्होंने शिक्षा के प्रसार से लेकर स्वदेशी, स्वाधीनता तथा सामाजिक क्रांति में अनूठा योगदान कर पूरे संसार में ख्याति अर्जित की थी।

14 मार्च 1884 को तिरुन्निवल्ली में डिप्टी कलेक्टर पी. नृसिंह शास्त्री के पुत्र के रूप में जन्में वेंकटरमण जन्मजात असाधारण प्रतिभा के स्वामी थे। उन्होंने सन्‌ 1904 में एक साथ सात विषयों में एम.ए. किया। साहित्य, भूगोल, इतिहास, संगीत, गणित, ज्योतिष जैसे विषयों में उनकी गहरी पैठ थी।

जिन दिनों वे बड़ौदा कॉलेज में विज्ञान तथा गणित के प्राध्यापक थे, उसी कॉलेज में महर्षि अरविंद दर्शनशास्त्र का अध्यापन करते थे। दोनों संपर्क में आए तथा राष्ट्रीय चेतना जागृत कर देश को स्वाधीन कराने के लिए योजना बनाने लगे। सन्‌ 1905 में बंगाल में स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा। वेंकटरमण शास्त्री तथा महर्षि अरविंद दोनों ने कलकत्ता पहुंचकर उसे गति प्रदान की। उनके ओजस्वी तथा तर्कपूर्ण भाषणों से बंगाल का प्रशासन कांप उठा था। वेंकटरमण शास्त्री की रुचि आध्यात्म की ओर बढ़ी तथा उन्होंने शृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी सच्चिदानंद शिवाभिनव नृसिंह सरस्वतीजी महाराज के सानिध्य में कठोरतम योग साधना की। गोवर्धनपीठ, पुरी के शंकराचार्य स्वामी मधुसूदन तीर्थ ने उन्हें संन्यास दीक्षा देकर वेंकटरमण की जगह स्वामी भारती कृष्णतीर्थ नामकरण कर दिया।

सन्‌ 1921 में उन्हें शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त किया गया। उसी वर्ष उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस महासमिति की कार्यकारिणी का सदस्य मनोनीत किया गया। स्वामीजी ने राजधर्म और प्रजाधर्म विषय पर एक भाषण दिया जिसे सरकार ने राजद्रोह के लिए भड़काने का अपराध बताकर उन्हें गिरफ्तार कर कराची की जेल में बंद कर दिया। बाद में स्वामीजी कांग्रेस के चर्चित अली बंधुओं के साथ बिहार की जेल में भी रहे। कारागार के एकांतवास में ही स्वामीजी ने अथर्ववेद के सोलह सूत्रों के आधार पर गणित की अनेक प्रवृत्तियों का समाधान एवं अनुसंधान किया। वे बीजगणित, त्रिकोणमिति आदि गणितशास्त्र की जटिल उपपत्तियों का समाधान वेद में ढूढ़ने में सफल रहे। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अनेक विश्ववविद्यालयों में गणित पर व्याख्यान दिए। कुछ ही दिनों में देश-विदेश में उनकी खोज की चर्चा होने लगी।

Bharatikrishna Teertha

स्वामीजी ने अंगरेजी में लगभग पांच हजार पृष्ठों का एक वृहद ग्रंथ ‘वंडर्स ऑफ वैदिक मैथेमेटिक्स’ लिखा। स्वामीजी के इस ग्रंथ का वैदिक गणित के नाम से हिंदी अनुवाद किया गया। स्वामी जी ने वैदिक गणित के अलावा ब्रह्मासूत्र भाष्यम, धर्म विधान तथा अन्य अनेक ग्रंथों का भी सृजन किया। ब्रह्मासूत्र के तीन खंडों का प्रकाशन कलकत्ता विश्वविद्यालय ने किया। सन्‌ 1953 में उन्होंने विश्वपुनर्निर्माण संघ की स्थापना की। उनका मत था कि आध्यात्मिक मूल्यों के माध्यम से ही विश्वशांति स्थापित की जा सकती है।

स्वामी भारती कृष्णतीर्थ आद्य शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित मठों के शंकराचार्य की शृंखला में एक ऐसे अनूठे धर्माचार्य थे। जिनके व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रतिभा तथा विभिन्न विधाओं का अनूठा संगम था। अनूठे ज्ञान से मंडित होने के बावजूद वे परम विरक्त तथा परमहंस कोटि के संन्यासी थे। वे अस्वस्थ हुए-उनके भक्तों की इच्छा थी कि उन्हें अमेरिका ले जाकर चिकित्सा कराई जाए। उन्होंने 2 फ़रवरी 1960 को निर्वाण प्राप्त करने से एक सप्ताह पूर्व ही कह दिया था कि संन्यासी को नश्वर शरीर की चिंता नहीं करनी चाहिए, जब भगवान का बुलावा आए उसे परलोक गमन के लिए तैयार रहना चाहिए।

Books by Swami Nishchalananda Saraswatiji

The highly revered Acharya  Swami Nishchalananda Saraswati has authored more than 140 books, all breath-takingly seminal and veritable mines of truth-inspired undying wisdom. Of these books, it is interesting to add, eleven books are on mathematics.

Holding “zero” to be a conceptual digit, the Acharya penned a whole book with the title “Swastik Mathematics”. Needless to add, the book had easily captured for itself the attention of the leading scientists and mathematicians of Oxford and Cambridge. Such was the impact of this unique mathematics treatise on professions the world over that a few mathematicians and scientists took pains to visit the Govardhan Matha of Puri for further enlightenment on the subject.