शून्यसे भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर विसङ्गतियाँ


श्रहरि:

 श्रीगणेशाय नम:

श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती

श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठ

  पुरी,  ओडिशा (भारत)

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निज  सचिव

स्वामी श्रीनिर्विकल्पानन्दसरस्वती

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ध्यान रहे; शून्यसे भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर निम्नलिखित विसङ्गतियाँ  सुनिश्चित हैं –

  1. न्यूनताकी ओर अभिमुख अवरोह क्रमसे उत्तराङ्ककी अपेक्षा पूर्वाङ्क सविशेष भावाङ्क होता है। अत 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर शून्यको भावाङ्क माननेकी विवशता होगी, जो कि आधुनिक गणितज्ञोंको अमान्य है।
  2. 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर अङ्कमूलकी सिद्धि असम्भव होगी। कारण यह है कि 1, 2, 3, 4 आदिके प्रवाहकी तरह – 1, -2, -3, -4….का प्रवाह असङ्ख्यपर्यन्त प्राप्त होगा। तथापि समुद्रके स्तर (तल) से नीचे या ऊपरके समान 0 से न्यून या अधिक कहनेकी अनिवार्यता होगी। अभिप्राय यह है कि अङ्कोंका उत्कर्षापकर्ष शून्यसापेक्ष ही मान्य होगा।

2 – 1 = 1, 3 – 1 = 2 आदि स्थलोंमें  ऋणफल  1 तथा 2 आदि  ऋणचिह्नित नहीं होते। तद्वत् 3 + 2 = 5, 4 + 2 = 6 आदि स्थलोंमें योगफल 5 तथा 6 आदि भी ऋणचिह्नित नहीं होते।

वस्तुत 2 – 3 = -1का अभिफ्राय ‘दो 3 से  एक अङ्क न्यून’ है, 1 – 2 = -1 का अभिफ्राय ‘ एक 2 से  एक अङ्क न्यून’ है; तद्वत् 0 – 1 = -1 का अभिफ्राय ‘0 एकसे एक अङ्क न्यून है ‘ ही सिद्ध है।

0 से एकादिकी न्यूनता सर्वथा असम्भव है। कारण यह है कि 20 – 11 में 0 से 1 का ऋण सर्वथा असम्भव ही है। इस स्थलमें दहाई स्थानापन्न 2 से 1 जिसका मान 10 है कर्षित करनेपर 10 से 1 का ऋण ही विहित है। अत: 0 – 1 = – 1 का अर्थ शून्यसे  एककी एक न्यूनता न होकर एकसे शून्यकी एक न्यूनता ही मान्य है।

  1. 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर 1, 2, 3 आदिके अतिरिक्त ऋणचिह्नित एकादि अङ्कोंकी भी स्वतत्र अङ्करूपमें मान्यता होगी।
  2. 0 से भी किसी अङ्क को न्यून माननेपर ‘मूले शून्यं विजानीयात्। शून्यं वै परं ब्रह्म।” (गणेशपूर्वतापिन्युपनिषत् 3.1) – ‘सर्व मूल शून्य परब्रह्मस्वरूप भावात्मक है”, ‘अशून्यं शून्यभावं तु “(तेजोबिन्दूपनिषत् 1.10)- ‘शून्य अभावात्मक नहीं है।”  आदि श्रौतसिद्धान्त बाधित होगा। जिसके फलस्वरूप अङ्काम्नाय दिशाहीन व्यापारतत्रमात्र सिद्ध होगा ।
  3. गणितज्ञोंका आकलन त्रुटिग्रस्त होगा, जिसके फलस्वरूप सम्बन्धित विज्ञान तथा कार्यक्षेत्र दिशाहीन विध्वंसक सिद्ध होगा।
  4. 0 – 1 = -1 को सैद्धान्तिक माननेपर ‘शिष्यते शेषसंज्ञः ” (श्रीमद्भागवत 10.3.25)- ‘अवशिष्ट भावकी शेषसंज्ञा है’, “अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् ” (बह्वचोपनिषत्) -‘अनात्मवस्तुओंका प्रतिषेध कर देनेपर उनका लयस्थान  अधिष्ठानस्वरूप एकमात्र परम तत्त्व ही शेष रहता है।’  इस वैदिकी परिभाषाका तिरस्कार होगा। जिसके फलस्वरूप गणित युक्तिविहीन उन्मत्तोंका अनर्गल प्रलापमात्र सिद्ध होगा।
  5. इकाईसे दहाई स्थानापन्न सङ्ख्याका, दहाईसे सैकड़ास्थानापन्न सङ्ख्याका, सैकड़ासे सहस्रस्थानापन्न सङ्ख्याका अर्थात् क्रमश: उत्तरोत्तर सङ्ख्याका मान अधिक मान्य है। 10, 200, 3000 आदि स्थलोंमें शून्य इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि क्रमसे सन्निहित है; अत: शून्यकी एकादिकी अपेक्षा न्यूनता तथा एकादिकी शून्यकी अपेक्षा अधिकता  सिद्ध है। अभिफ्राय यह है कि गणनाफ्रक्रममें  इकाई, दहाई, सैकड़ा,  हजार आदि स्थलोंमें  फ्रयुक्त शून्यका उत्तरवर्ती वामाङ्क एकादि होता है। वह ऋणचिह्नित नहीं होता और शून्यकी अपेक्षा अधिक ही होता है; न कि न्यून। शून्यसे किसी अङ्कको न्यून माननेपर उसमें शून्याभिव्यञ्जकताकी असिद्धि होगी।
  6.   3 – 1 = 2,   2 – 1 = 1, 1 -1 = 0 के अनुशीलनसे शून्यकी फ्रथमाङ्कता तथा एकसे एक अङ्क न्यूनता चरितार्थ है।
  7. 9 – 9 = 0 , 8 – 8 = 0, 7 – 7 = 0, 6 – 6 = 0, 5 – 5 =  0, 4 – 4 = 0, 3 – 3 =  0, 2 – 2 =  0, 1 – 1 =0 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है  कि शून्य स्वेतर एकादि किसी भी अङ्कसे उतने ही अङ्क पूर्व है। समानवाचोयुक्तिसे  0 – 0 = 0 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि शून्यसे शून्य शून्याङ्क न्यून है, अर्थात् शून्यके पूर्व कोई  अन्य  अङ्क नहीं है। 0 से भी किसी अङ्कको न्यून माननेपर इस सिद्धान्तका बाध होगा, अङ्कोंके चरम मूलका अभाव होगा।
  8. (-3) + (- 3) = – 6  , (- 2) + ( -2) = – 4  , (- 1) + (- 1) = – 2  के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है  कि वस्तुत: ऋणाङ्कघटित अङ्कका शून्य पूर्ववर्ती अङ्क नहीं है। अत: 0  – 1 = – 1 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है  कि 1 शून्यका उत्तराङ्क है।
  9. यद्यपि उत्तराङ्ककी अपेक्षा एक न्यून पूर्वाङ्क होता है, यथा 3 की अपेक्षा एक न्यून 2 और 2 की अपेक्षा एक न्यून एक तथा एककी अपेक्षा एक न्यून शून्य होता है, अत: समानवाचोयुक्तिसे शून्यकी अपेक्षा एक न्यून कोई अपूर्व अङ्क होना चाहिए; परन्तु ऐसा न होकर शून्यकी अपेक्षा एक न्यून ऋणचिह्नित 1 माना जाता है; जबकि  एक शून्यसे एकाधिक है। शून्यसे शून्यका ऋण करनेपर प्राप्त शून्य इस तथ्यको सिद्ध करता है कि शून्यसे न्यून कोई अङ्क नहीं है। जिस प्रकार एकादिसे एकादिका ऋण करनेपर शेष 0 होता है, उसी प्रकार शून्यसे शून्यका ऋण करनेपर  शेष शून्य होता है; अर्थात् शून्य सबका शेष है। वह ऋण्य नहीं होता।  जब सैद्धान्तिक धरातलपर शून्यसे शून्यका ऋण भी सम्भव नहीं, तब उससे अधिक एकादिका ऋण उससे कैसे सम्भव है? सर्वथा असम्भव ही है। भाजकसे भाज्यकी तुल्यता या अधिकताके तुल्य ऋण्यसे ऋणककी तुल्यता या अधिकता ही प्रशस्त है। एकसे दोके ऋणका अर्थ दो से एककी एकन्यूनता ही सिद्ध है। तद्वत् शून्यसे एकादिके ऋणका अर्थ एकादिसे शून्यकी न्यूनता ही सिद्ध है।  शून्य निर्विशेषताकी अवधि है, अत: उसके सदृश या उससे न्यून निर्विशेषाङ्क अङ्काम्नायको असह्य है। “अनाद्यनन्तं शिष्यत्यममलं निरामयम्’ (योगकुण्डल्युपनिषत् 3.35) के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि अमल निरामय अनादि और अनन्त ही अन्तिम शेष है। निर्विशेषताकी अवधि ही काष्ठा और परा गति परम मूल है। 3 – 6 = – 3 के तुल्य 0 – 3 = –  3 औपचारिक है ।  यह तथ्य प्रसिद्ध है कि प्रौढिवाद (असैद्धान्तिक प्रकल्प) सिद्धान्तसहिष्णु नहीं होता।   – 3  + 3 =  0 के अनुशीलनसे यह  सिद्ध है कि ऋणचिह्नित 3 आदिमें 3 आदिका ही योग करनेपर शेष 0 रहता है।   -3 + 1 =- 2,  – 2 + 1 = -1,   -1 +  1 = 0 में,   +1 की क्षतिपूरकता सिद्ध है। अभिप्राय यह है कि कोई रुपयेसे रिक्त है, परिस्थितिवश उसे 3 रुपयेका  व्यय प्राप्त है। दैवयोगसे उसे एक रुपया सुलभ होता है। फिर भी दो रुपयेकी आवश्यकता उसे बनी ही  रहती है। उसकी इस स्थितिको गणितकी भाषामें अङ्कित करना है तो 0 – 3 + 1 = – 2 अथवा – 3 + 1 = – 2 लिखनेकी प्रथा है। इस व्यावहारिक पक्षके दिग्दर्शनसे शून्यसे किसी अङ्ककी न्यूनता सिद्ध नहीं होती। एक ओर जीरो पावरके बल्बको विद्युत् का अभिव्यञ्जक माना जाता है, दूसरी ओर शून्यको अभावात्मक भी माना जाता है। जीरो डिग्रीसे नीचे आदि कथनकी भी प्रसिद्धि है ही। अत: शून्यके वास्तव स्वरूपको लेकर आधुनिक विचारक परस्पर विरुद्ध मान्यताओंसे ग्रस्त हैं।

इस सन्दर्भमें यह ध्यान रखना आवश्यक है कि चरम मूल निर्विशेषताकी अवधि मान्य है और चरम कार्य सविशेषताकी अवधि मान्य है। वेदान्तवेद्य ब्रह्म निर्विशेषताकी अवधि है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धयुक्त पृथ्वी सविशेषताकी अवधि है। अवान्तर विशेषतासम्पन्न किन्तु अतिरिक्त विशेषताविहीन वृक्षादि पृथ्वीके तारतम्यज सङ्घात हैं। तद्वत्  अङ्कगणितमें अङ्कादि (अङ्कका मूल) शून्य निर्विशेषताकी अवधि है और अङ्कान्त (अङ्ककी अवधि) 9 चरम विशेषतासम्पन्न है; अर्थात् इकाईस्थानापन्न अङ्कोंमें सबसे अधिक है। दस (10) आदि शून्य तथा एकादिके स्थानान्तर उल्लास हैं। अत: शून्यसे न्यून किसी अङ्ककी स्वीकृति असिद्ध है।

जिस प्रकार 1/2 = 0.5 में एक दोका अभाज्य है, इस तथ्यका द्योतक ‘0.’ है  और प्रथम भाज्य 1 के पश्चात् दाशमलविक विधाके अनुसार प्राप्त 10 दोका भाज्य है, इस तथ्यका द्योतक ‘.5′ है; उसी प्रकार  0 – 1 = -1 में  शून्य एकका ऋण्य नहीं है, इस तथ्यका द्योतक  ‘-‘ है और शून्य एकसे एक न्यून है , इस तथ्यका द्योतक ‘1’ है। गणितमें सन्निहित व्यङ्ग्यार्थको दार्शनिक विधासे समझनेकी आवश्यकता है।

  1. 10 में 2 से भाग देनेपर भागफल 5 मध्यवर्ती अङ्क मान्य है।  5 के बाद क्रमशः 6, 7, 8, 9 तथा 10 की दृष्टिसे पाँच और 10 के मध्यमें  6, 7, 8, 9 संज्ञक चार अङ्कोंका व्यवधान है। एकको प्रथमाङ्क माननेपर एक और पाँचके मध्य क्रमशः 2, 3 ,4 तीन ही अङ्क सिद्ध हैं। जबकि शून्यको प्रथमाङ्क माननेपर 0 और 5 के मध्य क्रमशः 1, 2, 3, 4 संज्ञक चार अङ्कोंका अन्तराल सिद्ध है।  अत: शून्यको प्रथमाङ्क माननेपर पूर्वोक्त  विसङ्गतिका समाधान हो जाता है। तद्वत् 20 को 2 से, 30 आदिको 2 से भाग देनेपर पूर्वोक्त विधासे प्राप्त विसङ्गतिका समाधान  शून्यको प्रथमाङ्क माननेपर ही सम्भव है।
  2. शून्योत्तर क्रमशः एकाधिक 1 ,2 , 3, 4 , 5, 6, 7, 8, 9 आदिकी सिद्धिके बिना ऋणचिह्नित 1 ,2 , 3, 4 , 5, 6, 7, 8, 9 आदिकी सिद्धि सर्वथा असम्भव है। कारण यह है कि प्राप्तका ही प्रतिषेध होता है, न कि सर्वथा अप्राप्तका। अत: शून्योत्तर एकादिके बिना ऋणचिह्नित एकादिकी सिद्धि सर्वथा असम्भव है; वह केवल व्यङ्ग्यार्थ शैलीमें ही प्रयुक्त है।
  3. यद्यपि गणनाकी दृष्टिसे एक फ्रथमाङ्क मान्य है, तथापि दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 11 अमान्य है, जब कि 10 मान्य है। 10 में 0 इकाईस्थानापन्न है और 1 दहाई स्थानापन्न है। 1 + 9 = 10 के अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या एक और एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9 के योगसे दसकी सिद्धि सम्भव है। कदाचित् एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1 ही होती , तब  एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9 उससे नौ गुण अधिक होनेके कारण दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 11 से दो अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 99 ; तद्वत् तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 111 से तीन अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 999, नौ गुण अधिक होती। तुल्य ाढमकी अनुवृत्ति अग्रिम चरणोंमे भी चरितार्थ होती। परन्तु दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 10, तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 100 , चार अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 1000 मान्य है तथा तुल्पामसे अग्रिम विधा भी चरितार्थ है।

उक्त रीतिसे गणना क्रमसे 1 और स्थानक्रमसे 0 प्रथमाङ्क है। संलग्नता सिद्धान्तके अनुसार 10 दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या है , जो कि एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1 x  एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9 से 1 अधिक है। इसी प्रकार संलग्नता सिद्धान्तके अनुसार 100 तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या है , जो कि एक अङ्ककी सबसे  छोटी सङ्ख्या 1 x  दो अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 99 से 1 अधिक है। इसी प्रकार संलग्नता सिद्धान्तके अनुसार 1000 चार अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या है , जो कि एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1  तीन अङ्कोंकी सबसे बड़ी सङ्ख्या 999 से 1 अधिक है। तद्वत् (एक अङ्ककी सबसे छोटी सङ्ख्या 1 x  एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9) + 1 = 10, (दो अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 10 x एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9) + 10 =100, (तीन अङ्कोंकी सबसे छोटी सङ्ख्या 100 x एक अङ्ककी सबसे बड़ी सङ्ख्या 9) + 100 = 1000 आदि क्रम भी चरितार्थ है।

 

  1. 0, 1, 2, 3 क्रमिक उत्कर्षके  और  3, 2 , 1, 0 क्रमिक अपकर्षके द्योतक हैं;  जबकि 0, -1, -2 , -3 आदि  क्रमिक अपकर्षके द्योतक हैं।  अत:  0, 1, 2, 3  क्रमिक उत्कर्षके द्योतकको  क्रमिक अपकर्षके द्योतकरूपमें   प्रस्तुत करनेके कारण शून्यसे भी न्यूनाङ्ककी प्रक्रिया गणितप्रस्थानमें वाममार्ग है।
  2. 0, 1, 2, 3 आदि आरोहाम जिस प्रकार ऋण विरहित भावात्मक है; उसी प्रकार 3, 2, 1, 0 यह अवरोहाम भी ऋणविरहित भावात्मक ही है। अत: ऋणचिह्न केवल अवरोहका द्योतक होनेके कारण ऋणचिह्नित एकादिकी शून्यसे उत्कृष्टता ही सिद्ध है।
  3. कहा जा सकता है कि उत्तराङ्कसे पूर्वाङ्क एक अङ्क न्यून होता है और पूर्वाङ्कसे उत्तराङ्क एक अङ्क अधिक होता है। ऐसी स्थितिमें शून्यसे एकका ऋण करनेपर प्राप्त  ‘-1 ‘ शून्यसे एक अङ्क न्यून है और 0+1=1 के अनुशीलनसे यह तथ्य  सिद्ध है कि एक शून्यसे एक अङ्क उत्तर है। अत एव  -1, -2, -3 आदि शून्यसे क्रमिक न्यूनाङ्क सिद्ध हैं।

परन्तु विचारणीय विषय यह है कि एकादिमें स्वयं एकादिसे ही योग करनेपर द्विगुण सङ्ख्याकी समुपलब्धि सुनिश्चित है। यथा;  1+1=2, 2+2=4, 3+3=6 आदि; जबकि 0+ 0 = 0 ही होता है। अत: शून्यसे ऋणचिह्नित एकादिकी क्रमिक पूर्वाङ्कता असिद्ध अर्थात् गौण है, न कि सिद्ध अर्थात् मुख्य। ‘मूलका मूल असिद्ध है’ – यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है। ‘मूले मूलाभावादमूलं मूलम् ‘(साङ्ख्यसूत्रम्  1.67 )-“मूलका मूल असम्भव है, अत अङ्कोंका मूल शून्य मूलरहित है।”

इस प्रकार; शून्यसे किसी अङ्ककी न्यूनता असिद्ध है।

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