नीतिनिधि


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मान्यवर पाठकवृन्द! सादर तथा सस्नेह स्मरण और अभिनन्दन।

विश्वहृदय भारतमें धर्मनियत्रित पक्षपातविहीन शोषणविनिर्मुक्त सर्वहितप्रद सनातन शासनतत्रकी स्थापना अपेक्षित है। नीति तथा अध्यात्मविहीन  वर्तमान  शिक्षा  तथा जीविका – पद्धति  देहात्मवादकी  जननी है। इसके कारण महानगरोंके माध्यमसे संयुक्त परिवारका विलोप दृष्टिगोचर है।  संयुक्त परिवारके विलोपके फलस्वरूप कुलधर्म, कुलदेवी, कुलदेवता, कुलगुरु, कुलवधू, कुलवर, कुलपुरुषका द्रुतगतिसे विलोप परिलक्षित  है। इनके  विलोपके  फलस्वरूप  वर्णसङ्करता तथा कर्मसङ्करताकी ; तद्वत्  विषयलोलुपता और बहिर्मुखताकी पराकाष्ठा परिलक्षित है। परम्पराप्राप्त  वर्णाश्रमानुरूप कर्मोंके विलोपके फलस्वरूप भोजन करने तथा सन्तान उत्पन्न करनेका मात्र यत्र बनकर  मनुष्यका अवशिष्ट रहना स्वाभाविक तथा सुनिश्चित है।

नीति , प्रीति, स्वार्थ तथा परमार्थमें सैद्धान्तिक सामञ्जस्य अपेक्षित है। इनके  सामञ्जस्यसे  शान्तिमय  तथा सुखमय जीवन  सम्भव है। नीतिनिपुणता तथा अध्यात्मनिष्ठासे जीवनकी सार्थकता सुनिश्चित है। “न हि बुद्ध्यान्वित: प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारद:।। निमज्जत्यापदं   प्राप्य   महतीं    दारुणामपि।” (महाभारत – शान्तिपर्व 138.39-40) -“बुद्धिमान्, विद्वान्  और नीतिशास्त्रमें निपुण व्यक्ति घोर विपत्ति प्राप्त होने पर भी उसमें निमग्न नहीं होता।।”,“सर्वोपजीवकं  लोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम्। धर्मार्थकाममूलं    हि   स्मृतं    मोक्षप्रदं   यत:।।” (पानीति 1. 5)-“सर्व उपकारक तथा लोकस्थितिमें  हेतु नीतिशास्त्र ही है। कारण यह है कि विचारकुशल मनीषियोंने इसे  धर्म, अर्थ, कामका मूल  तथा मोक्षप्रद माना है।।”

इस महायात्रिक युगमें धृतिविहीनता, कार्यसिद्धिके लिए अपेक्षित काल – श्रम – सहयोगी-निरपेक्षता तथा विधिविहीनताके फलस्वरूप भयातुरता, रुग्णता, असहायता, अपकर्षपूर्ण  शोकाकुलता , धर्म और अध्यात्मविमुखता  स्वाभाविक  तथा  सुनिश्चित है। इस विभीषिकासे  बचनेकी भावनासे  श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य पूज्यपाद स्वामी निश्चलानन्दसरस्वती महाभागके द्वारा विरचित  “नीति – निधि ” नामक  इस ग्रन्थका अध्ययन और अनुशीलन  तथा  तदनुकूल  जीवनका सम्पादन अपेक्षित है।  

पूज्यपादने   महाभारत, मनुस्मृति, दक्षस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, वाल्मीकीय रामायण , अद्भुतरामायण, गरुडपुराण , विष्णुपुराण, मत्स्यपुराण, नारदपुराण, श्रीमद्भागवतमहापुराण , वायुपुराण, अग्निपुराण, मार्कण्डेयपुराण, पद्मपुराण, पानीति , चाणक्यनीति, सुभाषितरत्नभाणडागार, नीतिप्रदीप, शार्ङ्गधरपद्धति ,भर्तृहरिसुभाषितसंग्रह , उज्ज्वलनीलमणि, पञ्चतत्र , सूतसंहिता, दृष्टान्तकलिकाशतकम् , पञ्चरत्नस्तोत्रम् , निरुक्तादि तथा ऋगादि वेदोंके नीति और अध्यात्मपरक वचनोंको हृदयङ्गमकर और उनका स्थलनिर्देशसहित सङ्कलनकर विषयक्रमसे उन्हें गुम्फित कर उनका ललित अनुवाद किया है और आवश्यकतानुसार अभिमत दृष्टिकोण तथा विवरण भी प्रस्तुत  किया है।

‘नीतिनिधि’ नामक इस ग्रन्थमें प्रसङ्गानुसार धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – संज्ञक  पुरुषार्थचतुष्टयका  निरूपण  समास और व्यासशैलीमें  सन्निहित है। इसमें वेद और वैदिक वाङ्मयका प्रामाणिक परिचय तथा हिन्दुत्वकी आधारशिलाका दिग्दर्शन है। तद्वत् इसमें साम, दान, दण्ड, भेद, उपेक्षा, माया और इन्द्रजाल – संज्ञक सप्तविध नीतिप्रभेदसे समन्वित प्रशस्त राजधर्मका  प्रतिपादन परिलक्षित है। ‘सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सुरक्षित, सम्पन्न, सेवापरायण , स्वस्थ  और सर्वहितप्रद व्यक्ति तथा समाजकी संरचना ‘ – पूज्यपादके द्वारा विश्वस्तरपर उद्घोषित राजनीतिकी इस परिभाषाको क्रियान्वित करनेका प्रकल्प इसमें सन्निहित है।

दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर सनातनधर्मकी चौबीस विशेषताओंका इसमें उल्लेख अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

इसके अध्ययन और अनुशीलनसे जीवनमें मानवोचित शुचिता, सुन्दरता, मुदिता, सुमति,  शील  तथा  स्नेहका  उदय , सनातन वर्णाश्रमधर्मके प्रति आस्था और अध्यात्मके प्रति अभिरुचि  तथा निष्ठा ; तद्वत् अन्योंके हितका ध्यान रखते हुए हिन्दुओंके अस्तित्व और आदर्शकी रक्षा , देशकी सुरक्षा और अखण्डताके प्रति कटिबद्धता सुनिश्चित है।

आत्माकी अद्वितीय ब्रह्मरूपताके अधिगमके  फलस्वरूप  मृत्यु, मोह और दु:खका आत्यन्तिक उच्छेद  मानवजीवनकी अपूर्वता  तथा  सार्थकता है। वर्तमान महायात्रिक युग मानवजीवनकी इस अपूर्वता तथा सार्थकताका अवश्य ही  अपहारक है। अत एव शूरता, सुशीलता,  ओजस्विता और अमोघदर्शितासम्पन्न  सर्वहितमें  प्रयुक्त  तथा विनियुक्त संयत जीवनकी स्फूर्तिकी भावनासे ‘नीतिनिधि’ नामक इस ग्रन्थका नित्य अध्ययन, अनुशीलन , प्रवचन अपेक्षित है। इसमें जीवनको दिशाहीन होनेसे बचानेकी भावनासे आर्योचित शीलसम्पन्न स्वस्थ जीवनकी  संरचनाके  लिए अपेक्षित  ज्ञाननिधिको सन्निहित किया गया है; तद्वत् व्यासपीठ तथा शासनतत्रमें सैद्धान्तिक सामञ्जस्यके फलस्वरूप समृद्ध राष्ट्रका प्रकल्प प्रस्तुत किया गया है।

कालगर्भित तथा कालातीत तत्त्वोंका परिज्ञान वेद तथा वैदिक वाङ्मयके अनुशीलनसे ही सम्भव है। वैदिक कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्डके विलोपसे सम्भावित विश्व नरक और नारकीय प्राणियोंका समुदाय ही सिद्ध होता है। चतुर्दश भुवनात्मक ब्रह्माण्डमें आधिभौतिक,   आध्यात्मिक और आधिदैविक धरातलपर जो कुछ दिव्यता है, वह श्रुतिसम्मत जीवनकी देन है। महासर्गके प्रारम्भमें वैदिक महर्षियोंकी धर्मपत्नियोंके गर्भसे विविध जङ्गम तथा स्थावर प्राणियोंकी अभिव्यक्ति एक अनुपम तथ्य है। अत एव वेद तथा वैदिक वाङ्मयके स्वरूप और माहात्म्यका परिज्ञान अपेक्षित है। तदर्थ इस ग्रन्थमें ‘हिन्दुनिरुक्ति’  , ‘वैदिक वाङ्मय’ , ‘वेदविज्ञानविमर्श’ , ‘वेदशब्दार्थविमर्श’,   ‘वेदसारार्थविमर्श ‘, अध्यात्मपरिशीलन , ‘सनातन – वैदिक सिद्धान्तोत्कर्ष  ‘ नामक निबन्धोंको सन्निहित किया गया है।

‘नीतिनिधि’ नामक इस ग्रन्थमें बीस सर्ग हैं। इसके  दैनिक अध्ययन और अनुशीलनसे निज जीवनकी सार्थकता , समुज्ज्वला वंशपरम्परा तथा स्वस्थसमाजकी संरचना सुनिश्चित है। प्रारम्भसे स्नातकोत्तर कक्षापर्यन्त पाठ्यपुस्तकरूपसे इसका नियोजन  आवश्यक है।

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