स्वस्थ क्रान्तिकी उद्भावना


प्रिय पाठकवृन्द!

सस्नेह स्मरण।

भारत सैद्धान्तिक धरातलपर स्वतत्र नहीं है। देशके मौलिक और प्रशस्त स्वरूपको ख्यापित करना स्वतन्त्रताका लक्ष्य है। सनातन वैदिक आर्यसिद्धान्त दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर इस महायान्त्रिक युगमें भी सर्वोत्कृष्ट है। वेदविहीन विज्ञान देहात्मवादका पोषक,पर्यावरणका प्रदूषक तथा अत्यन्त विस्फोटक है।

भारत अपनी मेधाशक्ति, रक्षाशक्ति,वाणिज्यशक्ति और श्रमशक्तिका सदुपयोग करनेमें अक्षम है। व्यक्ति, वर्ग और राष्ट्रको बाजारका सौदा बनानेमें दक्ष भारत अपने अस्तित्व और आदर्शकी रक्षा करनेमें सर्वथा असमर्थ सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें शिक्षा, रक्षा, न्याय, कृषि, गौरक्ष्य, वाणिज्यके सनातन प्रकल्पको समझने और क्रियान्वित करनेकी आवश्यकता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्वविहीन स्वतन्त्र भारतका शासनतत्र सत्तालोलुपता और अदूरदर्शिताके चपेटमें पड़कर तथा विविध तन्त्रोंके षड्यत्रका और अन्धानुकरणका ग्रास बनकर विकासके नामपर गोवंश, गङ्गा, सती, संस्कृति आदि सर्वहितप्रद प्रशस्त मानबिन्दुओंका विघातक सिद्ध हो रहा है।

ऐसी स्थितिमें सर्वहितकी भावनासे परस्पर सद्भावपूर्ण सम्वादके माध्यमसे सैद्धान्तिक निष्पत्ति प्राप्तकर स्वस्थ क्रान्तिको उद्भासित करनेकी आवश्यकता है।

 

भवदीय

 

स्वामी निश्चलानन्दसरस्वती

पुरी

ओडिशा (भारत)

22.7.2017