पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगदगुरु शङ्कराचार्य भगवान के अमृतवचन


जिन देशों में ब्राह्मण और परिव्राजकों का आध्यात्मिक मार्गदर्शन सुलभ न होने के कारण तथा अभ्युदय तथा नि:श्रेयस के अनुरुप आचाररुप क्रियालोप के कारण सनातन जातिधर्म और कुलधर्म का लोप सहस्त्रों वर्ष पहले हो गया उन देशवासियों का अर्थ , कामपरायण होना तथा केवल बौद्धिक धरातल पर नैतिकता और देहातिरिक्त आत्मा के अस्तित्व में आस्थान्वित होना अथवा देहात्मवाद के वशीभूत होकर पश्वादितुल्य जीवन व्यतीत करना या मानवोचित शील , संयमादि से गिर कर अराजक हो जाना स्वाभाविक है । परन्तु भारत तथा नेपाल आदि में विद्वेष और अज्ञानवश विकास के नाम पर वेद , विप्र, सती-साध्वी-पतिव्रता , सत्यवादी, निर्लोभ और दानशील तथा धर्म , काम , अर्थ , मोक्षसाधक पृथ्वी के धारक सनातन मार्ग का योजनाबद्ध विलोप का अभियान चलाना मानवता के लिये कलंक तथा पृथ्वी के लिये अभिशाप है । स्कन्ध पुराण में पृथ्वी के धारक इन सातों का वर्णन आया है ।

गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभि: सत्यवादिभि: ।
अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धायते मही ।।

अर्थ :- गोवंश , विप्र , वेद , सती , सत्यवादी , निर्लोभ और दानशील – इन सातों के द्वारा पृथिवी धारण की जाती है ।

इन सातों के विलोप का योजनाबद्ध अभियान भारत में और नेपाल अादि में चलाना पृथ्वी के लिये अभिशाप और मानवता के लिये कलंक है ।

हर हर महादेव