दारुब्रह्म


श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र पुरीमें नीलमहोदधिके तटपर नीलाद्रिके सन्निकट श्रीजगन्नाथादि दारुब्रह्म प्रतिष्ठित हैं। ऋग्वेदने दो ऋचाओंके माध्यमसे उनका यशोगान किया है – “अदो यद्दारुप्लवते  सिन्धो: पारे अपूरुषम् । तदारभस्व  दुहणो   तेन  गच्छ  परस्तरम्।। (ऋग्वेद 10. 155. 3) , यत्र    देवो   जगन्नाथ:   परपारं  महोदधे:। बलभद्र:  सुभद्रा  च तत्र  माममृतं   कृधि।। (ऋग्वेदपरिशिष्ट )” । नीलगगनमें सन्निहित नीलशब्द गम्भीरता तथा अनन्तताका द्योतक है। यही कारण है कि छान्दोग्योपनिषद् ने ‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्ये’ (8. 13.1) की  उक्तिसे पुरुषोत्तम परमात्माको श्याम अर्थात् नील कहा है। नीलाद्रि आसामसे उत्कलपर्यन्त विस्तृत है। यह दु:खापहारक  सच्चिदानन्दस्वरूप अनन्त सर्वेश्वरका स्मारक है। सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वेश्वर श्रीजगन्नाथादि भक्तवत्सल हैं। वे सर्व दु:खोंका दलन करनेमें समर्थ होनेके कारण दारुब्रह्म हैं।  ‘वंशस्तु भगवान्रुद्र:’ ( 8) कृष्णोपनिषद् के इस वचनके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि भगवान्  शिव ही प्रभु श्रीकृष्णचन्द्रके वेणु बने हैं; तद्वत् “द्यतिसंसारदु:खानि   ददाति  सुखमव्ययम्।। तस्माद्दारुमयं   ब्रह्म     वेदान्तेषु   प्रगीयते। (स्कन्दपुराण – 2वैष्णवान्तर्गत उत्कलखण्ड 4.73-73.1/2)”  इस वचनके अनुसार निरुक्तिसाम्यकी दृष्टिसे सर्वदु:खापहारक भगवान् रुद्र ही श्रीजगन्नाथादिके श्रीविग्रहके लिये दारुरूपसे अवतीर्ण हुए हैं।

निश्चलानन्दसरस्वती ज्येष्ठशुक्ल 12, 2074

6.6.2017