नीतिनिधि

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मान्यवर पाठकवृन्द! सादर तथा सस्नेह स्मरण और अभिनन्दन।

विश्वहृदय भारतमें धर्मनियत्रित पक्षपातविहीन शोषणविनिर्मुक्त सर्वहितप्रद सनातन शासनतत्रकी स्थापना अपेक्षित है। नीति तथा अध्यात्मविहीन  वर्तमान  शिक्षा  तथा जीविका – पद्धति  देहात्मवादकी  जननी है। इसके कारण महानगरोंके माध्यमसे संयुक्त परिवारका विलोप दृष्टिगोचर है।  संयुक्त परिवारके विलोपके फलस्वरूप कुलधर्म, कुलदेवी, कुलदेवता, कुलगुरु, कुलवधू, कुलवर, कुलपुरुषका द्रुतगतिसे विलोप परिलक्षित  है। इनके  विलोपके  फलस्वरूप  वर्णसङ्करता तथा कर्मसङ्करताकी ; तद्वत्  विषयलोलुपता और बहिर्मुखताकी पराकाष्ठा परिलक्षित है। परम्पराप्राप्त  वर्णाश्रमानुरूप कर्मोंके विलोपके फलस्वरूप भोजन करने तथा सन्तान उत्पन्न करनेका मात्र यत्र बनकर  मनुष्यका अवशिष्ट रहना स्वाभाविक तथा सुनिश्चित है।

नीति , प्रीति, स्वार्थ तथा परमार्थमें सैद्धान्तिक सामञ्जस्य अपेक्षित है। इनके  सामञ्जस्यसे  शान्तिमय  तथा सुखमय जीवन  सम्भव है। नीतिनिपुणता तथा अध्यात्मनिष्ठासे जीवनकी सार्थकता सुनिश्चित है। “न हि बुद्ध्यान्वित: प्राज्ञो नीतिशास्त्रविशारद:।। निमज्जत्यापदं   प्राप्य   महतीं    दारुणामपि।” (महाभारत – शान्तिपर्व 138.39-40) -“बुद्धिमान्, विद्वान्  और नीतिशास्त्रमें निपुण व्यक्ति घोर विपत्ति प्राप्त होने पर भी उसमें निमग्न नहीं होता।।”,“सर्वोपजीवकं  लोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम्। धर्मार्थकाममूलं    हि   स्मृतं    मोक्षप्रदं   यत:।।” (पानीति 1. 5)-“सर्व उपकारक तथा लोकस्थितिमें  हेतु नीतिशास्त्र ही है। कारण यह है कि विचारकुशल मनीषियोंने इसे  धर्म, अर्थ, कामका मूल  तथा मोक्षप्रद माना है।।”

इस महायात्रिक युगमें धृतिविहीनता, कार्यसिद्धिके लिए अपेक्षित काल – श्रम – सहयोगी-निरपेक्षता तथा विधिविहीनताके फलस्वरूप भयातुरता, रुग्णता, असहायता, अपकर्षपूर्ण  शोकाकुलता , धर्म और अध्यात्मविमुखता  स्वाभाविक  तथा  सुनिश्चित है। इस विभीषिकासे  बचनेकी भावनासे  श्रीगोवर्द्धनमठ – पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु – शङ्कराचार्य पूज्यपाद स्वामी निश्चलानन्दसरस्वती महाभागके द्वारा विरचित  “नीति – निधि ” नामक  इस ग्रन्थका अध्ययन और अनुशीलन  तथा  तदनुकूल  जीवनका सम्पादन अपेक्षित है।  

पूज्यपादने   महाभारत, मनुस्मृति, दक्षस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, वाल्मीकीय रामायण , अद्भुतरामायण, गरुडपुराण , विष्णुपुराण, मत्स्यपुराण, नारदपुराण, श्रीमद्भागवतमहापुराण , वायुपुराण, अग्निपुराण, मार्कण्डेयपुराण, पद्मपुराण, पानीति , चाणक्यनीति, सुभाषितरत्नभाणडागार, नीतिप्रदीप, शार्ङ्गधरपद्धति ,भर्तृहरिसुभाषितसंग्रह , उज्ज्वलनीलमणि, पञ्चतत्र , सूतसंहिता, दृष्टान्तकलिकाशतकम् , पञ्चरत्नस्तोत्रम् , निरुक्तादि तथा ऋगादि वेदोंके नीति और अध्यात्मपरक वचनोंको हृदयङ्गमकर और उनका स्थलनिर्देशसहित सङ्कलनकर विषयक्रमसे उन्हें गुम्फित कर उनका ललित अनुवाद किया है और आवश्यकतानुसार अभिमत दृष्टिकोण तथा विवरण भी प्रस्तुत  किया है।

‘नीतिनिधि’ नामक इस ग्रन्थमें प्रसङ्गानुसार धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष – संज्ञक  पुरुषार्थचतुष्टयका  निरूपण  समास और व्यासशैलीमें  सन्निहित है। इसमें वेद और वैदिक वाङ्मयका प्रामाणिक परिचय तथा हिन्दुत्वकी आधारशिलाका दिग्दर्शन है। तद्वत् इसमें साम, दान, दण्ड, भेद, उपेक्षा, माया और इन्द्रजाल – संज्ञक सप्तविध नीतिप्रभेदसे समन्वित प्रशस्त राजधर्मका  प्रतिपादन परिलक्षित है। ‘सुसंस्कृत, सुशिक्षित, सुरक्षित, सम्पन्न, सेवापरायण , स्वस्थ  और सर्वहितप्रद व्यक्ति तथा समाजकी संरचना ‘ – पूज्यपादके द्वारा विश्वस्तरपर उद्घोषित राजनीतिकी इस परिभाषाको क्रियान्वित करनेका प्रकल्प इसमें सन्निहित है।

दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातलपर सनातनधर्मकी चौबीस विशेषताओंका इसमें उल्लेख अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

इसके अध्ययन और अनुशीलनसे जीवनमें मानवोचित शुचिता, सुन्दरता, मुदिता, सुमति,  शील  तथा  स्नेहका  उदय , सनातन वर्णाश्रमधर्मके प्रति आस्था और अध्यात्मके प्रति अभिरुचि  तथा निष्ठा ; तद्वत् अन्योंके हितका ध्यान रखते हुए हिन्दुओंके अस्तित्व और आदर्शकी रक्षा , देशकी सुरक्षा और अखण्डताके प्रति कटिबद्धता सुनिश्चित है।

आत्माकी अद्वितीय ब्रह्मरूपताके अधिगमके  फलस्वरूप  मृत्यु, मोह और दु:खका आत्यन्तिक उच्छेद  मानवजीवनकी अपूर्वता  तथा  सार्थकता है। वर्तमान महायात्रिक युग मानवजीवनकी इस अपूर्वता तथा सार्थकताका अवश्य ही  अपहारक है। अत एव शूरता, सुशीलता,  ओजस्विता और अमोघदर्शितासम्पन्न  सर्वहितमें  प्रयुक्त  तथा विनियुक्त संयत जीवनकी स्फूर्तिकी भावनासे ‘नीतिनिधि’ नामक इस ग्रन्थका नित्य अध्ययन, अनुशीलन , प्रवचन अपेक्षित है। इसमें जीवनको दिशाहीन होनेसे बचानेकी भावनासे आर्योचित शीलसम्पन्न स्वस्थ जीवनकी  संरचनाके  लिए अपेक्षित  ज्ञाननिधिको सन्निहित किया गया है; तद्वत् व्यासपीठ तथा शासनतत्रमें सैद्धान्तिक सामञ्जस्यके फलस्वरूप समृद्ध राष्ट्रका प्रकल्प प्रस्तुत किया गया है।

कालगर्भित तथा कालातीत तत्त्वोंका परिज्ञान वेद तथा वैदिक वाङ्मयके अनुशीलनसे ही सम्भव है। वैदिक कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्डके विलोपसे सम्भावित विश्व नरक और नारकीय प्राणियोंका समुदाय ही सिद्ध होता है। चतुर्दश भुवनात्मक ब्रह्माण्डमें आधिभौतिक,   आध्यात्मिक और आधिदैविक धरातलपर जो कुछ दिव्यता है, वह श्रुतिसम्मत जीवनकी देन है। महासर्गके प्रारम्भमें वैदिक महर्षियोंकी धर्मपत्नियोंके गर्भसे विविध जङ्गम तथा स्थावर प्राणियोंकी अभिव्यक्ति एक अनुपम तथ्य है। अत एव वेद तथा वैदिक वाङ्मयके स्वरूप और माहात्म्यका परिज्ञान अपेक्षित है। तदर्थ इस ग्रन्थमें ‘हिन्दुनिरुक्ति’  , ‘वैदिक वाङ्मय’ , ‘वेदविज्ञानविमर्श’ , ‘वेदशब्दार्थविमर्श’,   ‘वेदसारार्थविमर्श ‘, अध्यात्मपरिशीलन , ‘सनातन – वैदिक सिद्धान्तोत्कर्ष  ‘ नामक निबन्धोंको सन्निहित किया गया है।

‘नीतिनिधि’ नामक इस ग्रन्थमें बीस सर्ग हैं। इसके  दैनिक अध्ययन और अनुशीलनसे निज जीवनकी सार्थकता , समुज्ज्वला वंशपरम्परा तथा स्वस्थसमाजकी संरचना सुनिश्चित है। प्रारम्भसे स्नातकोत्तर कक्षापर्यन्त पाठ्यपुस्तकरूपसे इसका नियोजन  आवश्यक है।

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Memorandum of Aditya Bahinee to the Hon’ble Chief Minister

“ଶ୍ରୀ ହରି”

ଶ୍ରୀ ଗଣେଶାୟ ନମଃ ।

ଜଗଦ୍‌ଗୁରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ସ୍ବାମୀ ନିଶ୍ଚଳାନନ୍ଦ ସରସ୍ବତୀ ମହାରାଜଙ୍କ ଦ୍ବାରା ଗଠିତ ସର୍ବଭାରତୀୟ ସେବା ସଂସ୍ଥା “ଆଦିତ୍ୟ ବାହିନୀ” ଓଡିଶା ଶାଖା ତରଫରୁ ଜଗଦ୍‌ଗୁରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ତଥା ଗୋବର୍ଦ୍ଧନ ମଠ(ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ପୀଠ) ପ୍ରତି ସରକାରଙ୍କ ନିମ୍ନୋକ୍ତ ଅବହେଳା ପୂର୍ବକ ଦମନ ନୀତି ବିରୁଦ୍ଧରେ ରାଜ୍ୟବ୍ୟାପୀ ପ୍ରତିବାଦର ସ୍ବର ଉତ୍ତୋଳନ ପାଇଁ ସ୍ଥିର କରାଯାଇଛି ।

୧. ଓଡିଶା ଜନସାଧାରଣ ଜଗନ୍ନାଥ ସଂସ୍କୃତି ଓ ପରମ୍ପରା ସହିତ ଜଡିତ ଥିବାବେଳେ ୨୫୦୦ ବର୍ଷ ତଳେ ଆଦି ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଦ୍ବାରା ମହାପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ମନ୍ଦିର ପୁନରୁଦ୍ଧାର ହୋଇଥିବା ବେଳେ ତାଙ୍କର ଦାୟାଦ ଭାବେ ବର୍ତ୍ତମାନର ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ଓ ତାଙ୍କ ପୀଠକୁ ଅବହେଳା ଓ ଅବମାନନା କରିବାରେ ରାଜ୍ୟ ସରକାରଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଣ?

୨. ସନାତନ ହିନ୍ଦୁ ଧର୍ମର ସୁରକ୍ଷା ତଥା ରାଜନୀତି ଅନୁଯାୟୀ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଧର୍ମଗୁରୁ ଜଗଦ୍‌ଗୁରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ମାର୍ଗଦର୍ଶନରେ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପ୍ରଶାସନ ପରିଚାଳିତ ହେବା କଥା,ମାତ୍ର ରାଜ୍ୟ ସରକାର ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପ୍ରଶାସକଙ୍କ ଉପରେ ସମସ୍ତ ଦାୟିତ୍ବ ଦେଇ ଜଗଦ୍‌ଗୁରୁଙ୍କୁ ଅବମାନନା କରିବା ଦ୍ବାରା ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ମନ୍ଦିରରେ ବିଭିର୍ନ୍ନ ସମୟରେ ବିଶୃଙ୍ଖଳା ସୃଷ୍ଟିକରି ଭକ୍ତମାନଙ୍କର ଜଗନ୍ନାଥ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ଠାରୁ ଆସ୍ଥା ବିଶ୍ବାସ ହରାଇବା ପାଇଁ ଚକ୍ରାନ୍ତ ପଛରେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଣ?

୩. ସନାତନ ଧର୍ମର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଧର୍ମଗୁରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ପୀଠକୁ ପର୍ଯ୍ୟଟନ ମାନଚିତ୍ରରେ ସ୍ଥାନିତ ନ କରିବା ପଛରେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଣ?

୪. ପୁରୀ ସହରରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ମଠ ମନ୍ଦିରକୁ ରାଜ୍ୟ ସରକାର ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପରିଚାଳନା ସମିତି ମାଧ୍ୟମରେ ଧ୍ବଂସ କରି ଆବାହମାନ କାଳରୁ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ମଠ ମନ୍ଦିରର ମହାନ୍ ସଂସ୍କୃତିକୁ ଲୋପ କରିବା ପଛରେ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଣ?

୫. ସନାତନ ହିନ୍ଦୁ ଧର୍ମକୁ ଛାଡି ଖ୍ରୀଷ୍ଟିୟାନ୍,ମୁସଲ୍‌ମାନ୍,ଶିଖ୍ ଓ ବୌଦ୍ଧ ଧର୍ମଗୁରୁ ମାନଙ୍କ ମଠ କିମ୍ବା ମନ୍ଦିର ପ୍ରତି ସରକାର ଏଭଳି ଆଚରଣ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିପାରିବେ କି?

୬. ସ୍ବର୍ଗଦ୍ବାର ଜମି ଦୁର୍ନୀତିର ମାମଲା ଖୋଳତାଡ ଆରମ୍ଭ ହେବା ପରେ ସରକାର ସେଥିପ୍ରତି କାର୍ଯ୍ୟାନୁଷ୍ଠାନ ଗ୍ରହଣ ନ କରି ଆକ୍ରୋଶ ମୂଳକ ଗୋବର୍ଦ୍ଧନ ମଠ ତଥା ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ପୀଠର ସମସ୍ତ ଜମି(୧୧ ଏକର ପାଖାପାଖି) କୁ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପରିଚାଳନା କମିଟି ନାମରେ ରେକଡ୍‌ଭୁକ୍ତ କରି ଜଗଦ୍‌ଗୁରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ ଦମନ କରିବା ଚକ୍ରାନ୍ତର କାରଣ କଣ?

୭. ୧୮୯୯ ମସିହାଠାରୁ ପୁରୀ ଗୋବର୍ଦ୍ଧନ ମଠର ଜଗଦ୍‌ଗୁରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ଉପରୋକ୍ତ ଜମିର ମାର୍ଫତ୍ ଥିବାବେଳେ ୧୯୯୩ ମସିହାଠାରୁ ସ୍ଥିତିବାନ୍ ସତ୍ତ୍ବ ସହ ରେକଡ୍‌ଭୁକ୍ତ ଜମିକୁ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପରିଚାଳନା ସମିତିକୁ ଷଡଯନ୍ତ୍ର ପୂର୍ବକ ହସ୍ତାନ୍ତର କରିବା ପଛରେ ସରକାରଙ୍କ ଆଭିମୁଖ୍ୟ କଣ?

୮. ପୂର୍ବ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ମାନଙ୍କ ୧୩୧ଟି ସମାଧି ମଧ୍ୟରୁ ୧୨୦ଟି ହୋଟେଲ୍,ଲଜିଂ,ବ୍ୟବସାୟିକ ଅନୁଷ୍ଠାନ ତଳେ ପୋତି ହୋଇ ରହିଥିବା ବେଳେ ୧୧ଟି ସମାଧି ଅଣନିଶ୍ବାସ ଅବସ୍ଥାରୁ ଉଦ୍ଧାର କରିବା ଯେଉଁ ଜମି ମଠର ବିଜେସ୍ଥଳୀ ମାଁ ବିମଳା ମନ୍ଦିର, ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ନିବାସ,ବେଦ ଅଧ୍ୟୟନରତ ଛାତ୍ରାବାସ,ଗୋଶାଳା ଅବସ୍ଥିତ ୫ଏକର ୭୬୩ ଡେ.ମି ଜମି ଗୋବର୍ଦ୍ଧନ ମଠ ହାତରୁ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପ୍ରଶାସନ ସମିତି ଅଧିକାରକୁ ନେବାର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଣ?

୯. ୨୫୦୦ ବର୍ଷ ତଳେ ଆଦି ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଦ୍ବାରା ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ୪ଟି ମଠ(ଭାରତର ପୂର୍ବ ଭାଗ ଓଡିଶା ପ୍ରଦେଶ ଠାରେ ଗୋବର୍ଦ୍ଧନ ମଠ, ପଶ୍ଚିମ ଭାଗ ଗୁଜୁରାଟ ପ୍ରଦେଶ ଦ୍ବାରିକା ଠାରେ ଶାରଦା ମଠ, ଉତ୍ତର ଭାଗ ଉତ୍ତରାଖଣ୍ଡ ପ୍ରଦେଶ ବଦ୍ରିନାଥ ଠାରେ ଯୋଶୀ ମଠ ଏବଂ ଦକ୍ଷିଣ ଭାଗ କର୍ଣାଟକ ପ୍ରଦେଶ ରାମେଶ୍ବର ଠାରେ ଶୃଙ୍ଗେରି ମଠ) ମଧ୍ୟରୁ ଓଡିଶା ସରକାରଙ୍କ ବ୍ୟତୀତ ଅନ୍ୟ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କର ସରକାର ଦେବୋତ୍ତର ଆଇନ୍ ବା ବିଭାଗରୁ ମୁକ୍ତ ରଖି ସ୍ବତନ୍ତ୍ର ମାନ୍ୟତା ଦେଇ ସ୍ବୟଂ ଶାସିତ ଅବସ୍ଥାରେ ରଖିଥିବା ବେଳେ ଓଡିଶା ସରକାର ଗୋବର୍ଦ୍ଧନ ମଠ ତଥା ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ପୀଠର ଅସ୍ଥିତ୍ବ ଲୋପ୍ କରିବା ଚକ୍ରାନ୍ତର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କଣ?

ଆସନ୍ତା ତା ୧୩.୦୬.୧୭ ରିଖରେ “ଆଦିତ୍ୟ ବାହିନୀ” ତରଫରୁ ରାଜ୍ୟର ସମସ୍ତ ଜିଲ୍ଲା ସଦର ମହକୁମାରେ ଶାନ୍ତିପୂର୍ଣ୍ଣ ପଦଯାତ୍ରା କରି ଜିଲ୍ଲା ପ୍ରଶାସନ ଜରିଆରେ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ସ୍ମାରକ ପତ୍ର ପ୍ରଦାନ କରାଯିବ ଏବଂ ତା ୨୨.୦୬.୧୭ ରିଖରେ ଭୁବନେଶ୍ବର ଠାରେ ପ୍ରତିବାଦ ଶୋଭା ଅନୁଷ୍ଠିତ ହେବ | ପରବର୍ତ୍ତୀ ଅବସ୍ଥାରେ ସନାତନ ହିନ୍ଦୁ ଧର୍ମର ରକ୍ଷା ପାଇଁ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ନବୀନ ପଟ୍ଟନାୟକଙ୍କ ସଦ୍‌ବୁଦ୍ଧି ଉଦୟ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଏକ ଯଜ୍ଞ ଅନୁଷ୍ଠିତ କରାଯିବାର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ମଧ୍ୟ ରହିଅଛି ।ଯେଉଁଥିରେ କି ସାରା ରାଜ୍ୟରୁ ୧୦ହଜାର ପାଖାପାଖି ଆଦିତ୍ୟ ବାହିନୀର କର୍ମକର୍ତ୍ତା ଯୋଗ ଦେବେବୋଲି ଆଶା କରାଯାଉଛି।
ପୁରୀର ଭାଇମାନଙ୍କୁ ନିବେଦନ ସନାତନ ହିନ୍ଦୁ ଧର୍ମକୁ ବିଲୋପ କରିବାକୁ ପ୍ରୟାସ ଜାରି ରଖିଥିବା ରାଜ୍ୟ ସରକାରଙ୍କ ଆଭିମୁଖ୍ୟ ସମ୍ପର୍କରେ ଜନସାଧାରଣଙ୍କୁ ସଚେତନ କରିବା ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ଆଦିତ୍ୟ ବାହିନୀକୁ ସହଯୋଗ କରନ୍ତୁ

शंकराचार्य जी का शासनतंत्र को निर्देश

किसानों द्वारा आत्महत्या के सन्दर्भ में पूरी शंकराचार्य जी का शासनतंत्र को निर्देश

सद्भावपूर्ण सम्वाद के माध्यम से सैद्धान्तिक सामंजस्य साधने में शासनतंत्र की असमर्थता के कारण किसान आत्महत्या करने के लिए बाध्य होते हैं और उग्र आंदोलन कर मृत्यु के ग्रास बनते हैं । शासनतंत्र का यह दायित्व है कि, वह राष्ट्र के उत्कर्ष की भावना से सनातन परम्परा प्राप्त कृषि विज्ञान की उपयोगिता को समझ कर अविलंब उसे क्रियान्वित करें । कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य तथा लघु उद्योगको अर्थ का स्रोत समझ कर इन्हें सुव्यवस्थित करें ।

-पूर्वाम्नाय श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज

श्री जगदीश रथयात्रा एवं चातुर्मास्यव्रत-निमंत्रण पत्र

श्री जगदीश रथयात्रा एवं चातुर्मास्यव्रत-निमंत्रण पत्र

गोवर्धन मठ पुरीपीठ,

श्री शंकराचार्य मार्ग,पूरी,ओडिशा

सम्माननीय सन्त तथा भक्तवृन्द,

सस्नेह स्मरण तथा सादर अभिनंदन ! निम्नलिखित कार्यक्रमोंमें आप सादर तथा सानन्द आमंत्रित हैं ।

श्री जगदीश्वर रथयात्रा महोत्सव

विदित हो कि इस वर्ष श्री बलभद्र और भगवती शुभद्रासहित महाप्रभु श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया,वि.सं.२०७४ रविवार  तदनुसार 25th June-2017 को प्रारंभ होगी । इस महोत्सव में सम्मिलित होकर आप प्रमुदित हों तथा पुण्य के भागी बनें ।

चातुर्मास्यव्रत महोत्सव

युधिष्ठिर संवत २६३१ तदनुसार ई. सन् से ५०७ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी रविवार को भगवाद्पाद श्री शिवस्वरूप आदि शंकराचार्य अवतीर्ण हुए । उन्होंने अपने चिन्मय करकमलों से युधिष्ठिर संवत २६५५ तदनुसार ई. सन् से ४८३ और सन् २०१७ से २५०० वर्ष पूर्व वैशाख शुक्लदशमी को ऋग्वेदी पूर्वाम्नाय श्री गोवर्धन मठ पूरी पीठ के प्रथम शिष्य श्रीपद्मपाद महाभाग को प्रतिष्ठित तथा अभिषिक्त किया एवं मूर्ति भंजकों के शासन काल में अदृष्टिगोचर श्री जगन्नाथादि चतुर्व्यूहको पुरुषोत्तम क्षेत्र श्रीमंदिर पूरी में पुनः प्रतिष्ठित किया । श्री पद्मपादाचार्य महाभागकी प्रशस्त परंपरा में 145 वें श्रीमदज्जागदगुरु  शंकाराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वतीजी महाराज इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल 15 गुरुपूर्णिमा वि.सं. २०७५ से भाद्र शुक्ल १५ रविवार,तदनुसार ६ सितंबर २०१७ पर्यन्त श्री गोवर्धन मठ -पूरी पीठ पूरी में चातुर्मास्य व्रत सम्पन्न करेंगे । इस अवसर पर आप अपने सुविधानुसार समुपस्थित होकर महोत्सव की शोभा बढ़ावें ,ऐसी भावना हैं ।

दैनिक कार्यक्रम

-प्रातः 10.00-12.00-छान्दोग्य उपनिषद्, बृहदारण्यक उपनिषद्-शांकरभाष्य-आनंदगिरि विरचित टीका सहित अध्यापन

-सायं 4.30-06.00-श्रीमद्भागवत कथा

-रात्रि 8.00-9.00-ब्रह्मसूत्र – भामतीटीका सहित अध्यापन

दारुब्रह्म

श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र पुरीमें नीलमहोदधिके तटपर नीलाद्रिके सन्निकट श्रीजगन्नाथादि दारुब्रह्म प्रतिष्ठित हैं। ऋग्वेदने दो ऋचाओंके माध्यमसे उनका यशोगान किया है – “अदो यद्दारुप्लवते  सिन्धो: पारे अपूरुषम् । तदारभस्व  दुहणो   तेन  गच्छ  परस्तरम्।। (ऋग्वेद 10. 155. 3) , यत्र    देवो   जगन्नाथ:   परपारं  महोदधे:। बलभद्र:  सुभद्रा  च तत्र  माममृतं   कृधि।। (ऋग्वेदपरिशिष्ट )” । नीलगगनमें सन्निहित नीलशब्द गम्भीरता तथा अनन्तताका द्योतक है। यही कारण है कि छान्दोग्योपनिषद् ने ‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्ये’ (8. 13.1) की  उक्तिसे पुरुषोत्तम परमात्माको श्याम अर्थात् नील कहा है। नीलाद्रि आसामसे उत्कलपर्यन्त विस्तृत है। यह दु:खापहारक  सच्चिदानन्दस्वरूप अनन्त सर्वेश्वरका स्मारक है। सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वेश्वर श्रीजगन्नाथादि भक्तवत्सल हैं। वे सर्व दु:खोंका दलन करनेमें समर्थ होनेके कारण दारुब्रह्म हैं।  ‘वंशस्तु भगवान्रुद्र:’ ( 8) कृष्णोपनिषद् के इस वचनके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि भगवान्  शिव ही प्रभु श्रीकृष्णचन्द्रके वेणु बने हैं; तद्वत् “द्यतिसंसारदु:खानि   ददाति  सुखमव्ययम्।। तस्माद्दारुमयं   ब्रह्म     वेदान्तेषु   प्रगीयते। (स्कन्दपुराण – 2वैष्णवान्तर्गत उत्कलखण्ड 4.73-73.1/2)”  इस वचनके अनुसार निरुक्तिसाम्यकी दृष्टिसे सर्वदु:खापहारक भगवान् रुद्र ही श्रीजगन्नाथादिके श्रीविग्रहके लिये दारुरूपसे अवतीर्ण हुए हैं।

निश्चलानन्दसरस्वती ज्येष्ठशुक्ल 12, 2074

6.6.2017