भगवत्पाद शङ्कराचार्य


ईसवी सन से ५०७ वर्ष पूर्व भगवान शिव शंकराचार्य के रुप में भारत के केरल क्षेत्र में उत्पन्न हुऐ । वायुपुराण में , शिव पुराण में शंकराचार्य को शिव का ही अवतार माना गया है । कुल बत्तीस वर्ष की आयु उन्हें प्राप्त थी । बत्तीस वर्ष की आयु की सीमा में उन्होंने ईश , केन , कठ इत्यादि उपनिषदों पर भाष्य लिखा । ब्रह्मसूत्र जिसको वेदान्त दर्शन कहते हैं उस पर उन्होंने भाष्य लिखा । श्रीमदभगवदगीता पर भाष्य लिखा । बहुत से प्रकरण ग्रन्थों की संरचना की । प्रपञ्च सार नामक ग्रन्थ को तन्त्र की दृष्टि से उन्होंने लिखा । सनातन देवी देवताओं की उन्होंने स्तुति भी लिखी । कालक्रम से विकृत ज्ञान-विज्ञान को उन्होंने परंपरा प्राप्त अदभुत मेधा शक्ति के बल पर विशुद्ध किया औेर कालक्रम से विलुप्त ज्ञान विज्ञान को प्रकट किया । उस समय बौद्ध , जैन , कापालिक और विविध द्वैतवादियों का बहुत ही प्रभाव था । वेदों के परम तात्पर्य को उन्होंने युक्ति और अनुभूति के बल पर ख्यापित करके वेदों के प्रति और वेदार्थ के प्रति विद्वान मनीषियों को आस्थान्वित किया । मूर्तिभंजकों के शासनकाल में बद्रीनाथ का दर्शन सुलभ नहीं था । भगवत्पाद शिवावतार शंकराचार्य महाभाग ने ही नारदकुण्ड में सन्निहित बद्रीनाथ को प्राप्तकर अपने चिन्मय करकमलों से पुन: प्रतिष्ठित किया , पुरुषोत्तमक्षेत्र पुरी में मूर्तिभंजकों के शासनकाल में अदृष्टिगोचर दारुब्रह्म श्रीजगन्नाथादि को अपने चिन्मय करकमलों से उन्होंने प्रतिष्ठित किया । द्वारका पुरी में भी मूर्तिभंजकों के शासनकाल में अदृष्टिगोचर भगवान द्वारकाधीश को उन्होंने अपने चिन्मय करकमलों से प्रतिष्ठित किया । इसी प्रकार पुष्कर में ब्रह्माजी के अर्चाविग्रह का भी दर्शन सुलभ नहीं था , उन्होंने अपने चिन्मय करकमलों से ब्रह्माजी को पुन:प्रतिष्ठित किया । नेपाल में पशुपतिनाथ किसी और रुप में पूजित हो रहे थे , वैदिक विधा से पुन: शिवलिंग के रुप में ख्यापित और पूजित प्रतिष्ठित किया , साथ ही साथ सनातन वर्णाश्रमम व्यवस्था को पूर्ण रुप से विकसित किया । उस समय के मण्डन मिश्र इत्यादि महानुभावों को शास्त्रार्थ में प्रमुदित करते हुए जीतकर उन्होंने उन्हें सन्यास की दिक्षा दी । योगशिखोपनिषद् में अपने शरीर में सात चक्रों के अंतर्गत चार आम्नाय पीठ का वर्णन है उसे आधिदैविक धरातल पर भारत में उन्होंने ख्यापित किया । पूर्व दिशा में पुरुषोत्तमक्षेत्र पुरी में ऋग्वेद से सम्बद्ध पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ की स्थापना उन्होंने पच्चीस सौ एक वर्ष पूर्व की । श्री रामेश्वरम् से संलग्न और सम्बद्ध दक्षिण दिशा में श्रृंगेरी में उन्होंने एक पीठ की  स्थापना की जो यजुर्वेद से सम्बद्ध है , पश्चिम दिशा में द्वारका पुरी में उन्होंने सामवेद से सम्बद्ध एक पीठ की स्थापना की । उत्तर दिशा में बद्रीवन की सीमा में बद्रिनाथ के क्षेत्र में ज्योर्तिमठ की स्थापना की जो अथर्ववेद से सम्बद्ध है । एक-एक वेद से सम्बद्ध एक-एक पीठ को यह दायित्व दिया की उपवेदादि जो वैदिक वांगमय हैं और उनसे सम्बद्ध जितनी कलाएं हैं , बत्तीस विद्या चौंसठ कला उज्जीवित रहें इसका दायित्व चारों पीठों को उन्होंने प्रदान किया । सन्यास आश्रम जो श्रौत है उसको परखकर उन्होंने चार पीठों के तो एक-एक आचार्य बनाया ही उन्हें शंकराचार्य का पद प्रदान किया , जगदगुरु शंकराचार्य का पद । सत्तर श्लोंकों में उन्होंने चारों मठों के संचालन का संविधान मठाम्नाय सेतु मठाम्नाय महानुशासनम के रुप में व्यक्त किया । कुल सत्तर श्लोक हैं जिनके माध्यम से चारों मठोंके पीठों का संचालन होता है । एक एक मठ से सम्बद्ध एक एक देवी , एक एक क्षेत्र , एक एक गोत्र उन्होंने ख्यापित किया । जैसे राजधानी ही राष्ट्र का क्षेत्रफल नहीं मान्य है , इसी प्रकार ये जो चार धार्मिक ,आध्यात्मिक राजधानीयां उन्होंने बनाई ख्यापित की उनके साथ पूरे भूमण्डल को जोड़ा । अंग्रेजों ने भगवान शंकराचार्य का जो काल ख्यापित किया है वो उनकी कूटनीति का परिणाम है । सचमुच में जिस समय भगवतपाद शंकराचार्य महाभाग का आविर्भाव हुआ उस समय विश्व में ना मोहम्मद साहब हुऐ थे ना ईसा मसीह ना उनके अनुयायी थे कोई । भगवतपाद शंकराचार्य महाभाग ने युधिष्ठिर जी की परंपरा में उत्पन्न सुधन्वा जो की बौद्धों के संसर्ग में आकर बौद्ध सम्राट हो गये थे , वैदिक धर्म के पतन , उच्छेद में अपनी शक्ति का उपयोग कर रहे थे , कुमारिल भट्ट के सहित शंकराचार्य महाभाग ने उनके हृदय और मस्तिष्क का शोधन कर सनातन वैदिक, आर्य सम्राट के रुप में उन्हें ख्यापित किया । और चारों पीठों की मर्यादा सुरक्षित रहे इसका भी दायित्व प्रदान किया । सुधन्वा जी सार्वभौम पृथ्वी के सम्राट के रुप में उद्घोषित किये गये । साथ ही साथ यह भी समझने की आवश्यकता है शंकराचार्य जी ने सन्यासीयों के दश प्रभेद ख्यापित किया । गोवर्धनमठ पुरीपीठ से सम्बद्ध वन और अरण्य दो प्रकार के सन्यासीयों को यह दायित्व दिया की वन औेर अरण्य सुरक्षित रहें , वनवासी और अरण्यवासी सुरक्षित रहें । विधर्मियों की दाल न गले । महाभारत में वनपर्व के अंतर्गत अरण्य पर्व है । छोटे वन का नाम अरण्य होता है बृहत् अरण्य ना नाम वन होता है । पर्यावरण की दृष्टि से शंकराचार्य जी ने वन अरण्य को बहुत महत्व दिया क्योंकि आप जानते होंगें जो सात द्विपों वाली पृथ्वी है , द्विपों का जो विभाग और नामकरण है , वृक्ष , वनस्पति के नाम पर , स्थावर प्राणी के नाम पर । जम्बूद्वीप , कुशद्विप इत्यादि , कुश जानते ही हैं और जामुन का फल , इसी प्रकार से पर्वत के नाम पर क्रौंच द्वीप जैसे कहा गया , और सागर में क्षीर सागर भी है और क्षारसिन्धु भी है । तो जल को लेकर,  पर्वत को लेकर और वृक्ष वन को लेकर द्विपों का विभाग पहले किया गया था  । इसी दृष्टि से भगवतपाद शंकराचार्य महाभाग ने वन और अरण्य तथा वनवासी और अरण्यवासियों को सुरक्षित रखने कि भावना से औेर विधर्मियों की दाल वन में अरण्य मे ना गले , इस भावना से वन अरण्य नामा सन्यासीयों को ख्यापित किया । शिक्षण संस्थान की दृष्टी से सरस्वती और भारती , दो दो सन्यासीयों को ख्यापित किया । उच्च शिक्षण संस्थान की दृष्टि से सरस्वती नामा सन्यासी , मध्यम आवर संस्थान की दृष्टि से भारती नामा सन्यासी को उन्होंने ख्यापित किया ताकि शिक्षण संस्थानों के माध्यम से दिशाहीनता प्राप्त ना हो । नीति आध्यात्म विरुद्ध शिक्षा पद्धति क्रियान्वित न हो । अयोध्या, मथुरादि जो हमारी पुरीयां हैं उन पुरीयों को सुव्यवस्थित रखने की भावना से पुरीनामा सन्यासी को  शंकराचार्य जी ने ख्यापित किया । तीर्थ औेर आश्रम हमारे दिशाहीन ना हों इस भावना से द्वारका पीठ से सम्बद्ध तीर्थ और आश्रम नामा सन्यासीयों को उन्होंने ख्यापित किया । सागर , समुद्र , पर्वत और गिरी । बृहद गिरी का नाम पर्वत , छोटे पर्वत का नाम गिरी होता है । मत्स्यपुराण के अनुसार पर्वत ,  गिरी , सागर नामा सन्यासियों को शंकराचार्य जी ने उदभासित किया । कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान के आतंकवादी सागर के माध्यम से मुंबई में घुसे थे । भगवान शंकराचार्य की शिक्षा क्रियान्वित होती तो हमारे सागर सुरक्षित रहते । सागर के माध्यम से किसी भी अराजक तत्व,  विधर्मियों के प्रवेश का मार्ग सर्वथा अविरुद्ध रहता और शंकराचार्य जी ने यह भी कहा ” यथा देवे तथा गुरौ ” श्वेताश्वतरोपनिषद की इस पक्तिं को उद्धृत करके उन्होंने बताया की ” मेरी गद्दी पर जो विधिवत प्रतिष्ठित आचार्य होंगें वो मेरे ही स्वरुप होंगें ” । और शिवपुराण के अनुसार यह भी बताया गया की भगवान चार युगों में चार गुरु का रुप धारण करते हैं । एक प्रक्रिया यह है की कृतयुग(सत्ययुग) में ब्रह्माजी गुरु होते हैं सार्वभौम , त्रेता में वशिष्ठ जी होते हैं । द्वापर में व्यास जी होते हैं , कलियुग में शंकराचार्य गुरु होते हैं । दूसरी परंपरा यह है , भगवान शिव के अवतार दक्षिणामूर्ति कृतयुग या सत्ययुग में गुरु होते हैं , दत्तात्रेय महाभाग त्रेता में गुरु होते हैं , वेदव्यास जी द्वापर में गुरु होते हैं , कलियुग के अंतिमचरण तक भगवान शंकराचार्य उसकी और उनके द्वारा ख्यापित पीठों के आचार्य गुरु होते हैं ।